क्यूसीओ और बाजार का वर्तमान परिदृश्य और भविष्य – भाग 3
- जून 12, 2024
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आदित्य गर्ग (संदीप गर्ग के पुत्र): फरवरी में बीआईएस लागू होगा। यह तय हो गया है। लेकिन दिक्कत यह है कि अभी छोटे यूनिट संचालकों में जागरूकता नहीं है। उन्हें जागरूक करने की जरूरत है।
सैंपल की जांच तेज होनी चाहिए। एक सैंपल की जांच में तीन माह का समय लग जाता है। इस तरह से देखा जाए तो कम से कम छह माह का समय लाइसेंस लेने में लग जाता है। यह व्यवस्था की जानी चाहिए कि ज्यादा से ज्यादा उद्योगपतियों को लाइसेंस उपलब्ध कराया जाए।
कंडीशनल लाइसेंस दिया जाना भी एक तरीका हो सकता है। जिसमें शर्त हो सकती है कि यदि सैंपल पास हो गया तो लाइसेंस दे दिया जाएगा।
यदि सब कुछ उद्योग पर छोड़ दिया गया तो एक भगदड़ भरा वातावरण हो जाएगा। जिनके पास लाइसेंस नहीं होगा तो उन्हें अपना यूनिट बंद करना पड़ सकता है। बीआईएस सभी के पास पहुंच भी नहीं सकता।
हमें उद्योग के भले के बारे में सोचना है। हमें यह देखना है कि फरवरी तक कैसे सभी उद्योगपत्ति लाइसेंस के दायरे में आ जाएं। इसके लिए बीआईएस को भी पहल करनी होगी। एसोसिएशन को भी उनके साथ सहयोग करना होगा।

अभी यह पता ही नहीं चलता कि सेंपल कहां से लिया गया। कहीं से भी सैंपल लेने से पहले उत्पादक को बताना चाहिए। जिससे यह पता चले कि सैंपल सही जगह से लिया गया है या नहीं। उक्त डीलर ने हमसे माल खरीदा है या नहीं। क्योंकि यदि उसने डूप्लीकेट मार्किंग कर रखी है तो सैंपल की जिम्मेदारी डीलर की होनी चाहिए।
हम अपनी एसोसिएशन के साथ मिल कर लगातार उन सभी संचालकों को जागरूक करने के काम में लगे हुए हैं, जिनके पास अभी तक लाइसेंस नहीं है।
डॉ. एमपी सिंह
बीआईएस के पास ही समाधान है। उन्हें यह समझना होगा कि समस्या कितनी बड़ी है। इसलिए सभी एसोसिएशनों को मिल कर बीआईएस के समक्ष यह बातें उठानी चाहिए।
इसमें दो राय नहीं कि हर कलस्टर के अपने-अपने मुद्दे होंगे। यह सभी मिल कर उठाने चाहिए।
बीआईएस को यदि अच्छी तरह से लिख कर दे दिया तो निश्चित ही समस्या का समाधान निकल सकता है।
इसके लिए बीआईएस की टॉप मैनेजमेंट से बात करनी होगी। क्योंकि जो अधिकारी मुख्यालय में बैठे हैं, उन तक मुद्दे ले जाने की आवश्यकता है। उनके सामने समस्या रखनी होगी इसके साथ ही संभावित समाधान भी रखना होगा।
मनोज गवारीः बीआईएस से घबराने की नहीं बल्कि उनके साथ चलने की जरूरत है
सबसे पहले तो बीआईएस और इसके काम के बारे में जानना उचित होगा। बीआईएस मानक तय करता है, इसके बाद उत्पादन स्थल पर उत्पाद मानकों के दिशा निर्देशानुसार बनें, यह उत्पादक की जिम्मेवारी है। फैक्टरी में यह जांच करने की जिम्मेदारी ठप्ै की है कि तय मानकों के अनुसार उत्पाद तैयार हो रहे हैं या नहीं।
बीआईएस उद्योग के कल्याण की भावना से काम करता है। अब यदि प्लाईवुड उत्पादक चाहते हैं कि कुछ बदलाव हो, तो इस बात की जानकारी बीआईएस को देंगे तभी बीआईएस इस पर रिसर्च करेगा। अधिकारियों को यह बताने की जरूरत है कि इंडस्ट्री को वास्तव में चाहिए क्या?
फरवरी 2025 के बाद जब फब्व् लागू हो जाएगा प्रत्येक उत्पादकों को तय मानकों के अनुसार ही उत्पाद तैयार करना होगा। यदि कोई ऐसा नहीं करता तो तीन माह के लिए स्टॉप मार्किंग हो जाएगी। तब आप कानूनन अपना उत्पाद का भी निर्माण नहीं कर पाएंगे।

प्रयोगशालाओं पर अब कार्यभार बढ़ने वाला है। इसलिए कलस्टर स्तर पर प्रयोगशाला होनी चाहिए। अब टाइप टू लाइसेंस सिस्टम में भारतीय उद्योगों को डाला गया है। इसमें सैंपल किसी ऐसी प्रयोगशाला से पास कराना होगा, जो बीआईएस से मान्यता प्राप्त हो। टेस्ट वहां से सैंपल पास होने के बाद रिपोर्ट के साथ लाइसेंस के लिए आवेदन करना होगा। अगले दस दिनों में लाइसेंस मिल जाएगा।
यह टेस्ट 21 दिन के भीतर हो जाता है। जिस दिन लाइसेंस मिलेगा उस दिन सैंपल फिर लिया जाएगा। यदि सैंपल फेल हो गया तो स्टाप मार्किंग ही होगी। यह बहुत ही साधारण सी प्रक्रिया है।
समस्या यह है कि IS: 303 की सैंपल जांच के लिए देश में 40 से 45 प्रयोगशाला है। अब उद्योगपति अपनी सुविधा से प्रयोगशाला चुन लेते हैं। कुछ प्रयोगशालाओं के पास तो काम बहुत ज्यादा है। कुछ के पास काम ही नहीं है।
भारतीय मानक ब्यूरो ने कलस्टर प्रयोगशाला का प्रावधान भी रखा है। यहां नियमित सैंपल की जांच हो सकती है। इसमें सारा खर्च उद्योगपतियों को उठाना होगा। बस बीआईएस इसे मान्यता देगा।
यदि लाइसेंस धारक को लायसेंस की समयावधि समाप्त होने पर तीन माह के भीतर यदि लाइसेंस फीस नहीं देता, तो उसे एक नोटिस दिया जाता है। फिर और एक नोटिस दिया जाता है, लेकिन तब तक उद्योगपति इस ओर ध्यान नहीं देते। इसलिए लाइसेंस कैंसिल हो जाते हैं।
इसके साथ ही यदि दो बार सैंपल फेल आ गया तो लाइसेंस कैंसिल हो जाएगा।
विदेशी उत्पादकों के लिए साल में एक बार विजिट रखी है। उन्हें यह भी सुविधा है कि स्टाप मार्किंग में वह अपने तैयार माल को भारत की बजाय किसी दूसरे देश में बेच सकता है। भारतीय उद्योगपतियों को यह सुविधा नहीं है। इस समस्या को बीआईएस के अधिकारियों के सामने रखा जाना चाहिए। जिससे समय रहते इसका समाधान हो सके।
IS: 2202 के मानक तय हो गए हैं। बीआईएस ने सभी को पत्र लिखा है कि इस मानकों के अनुसार उत्पाद तैयार हो रहा है या नहीं। ज्यादातर ने स्वीकार किया कि तय मानकों के अनुसार उत्पाद तैयार हो रहे हैं।
अब जिन्होंने इसे मान लिया तो वह जबड़े का प्रयोग फ्लस डोर में इस्तेमाल नहीं करेंगे।
जो भी प्रावधान आते हैं, उसे अच्छे से पढ़ना चाहिए, क्योंकि आम तौर पर होता यह है कि इसे पढ़ा ही नहीं जाता।
IS: 303 के मानक आ गए हैं। इसमें आकार को लेकर - 3 लंबाई में और चौड़ाई में - 1 एमएम की छूट हैं। शैटरिंग और मैरिन में भी इसी तरह की छूट मिल जाए तो हमारे लिए काम आसान हो जाएगा। क्योंकि लंबाई चौड़ाई में कमी की वजह से काफी सैंपल फेल हो जाते हैं।
IS: 710 क्लॉज नंबर 5.3 के अनुसार बोर्ड बनने के बाद उसे प्रीजरवेटिभ ट्रीटमेंट देने पर 12 एमएम का वह बोर्ड नॉर्मली 13.5 एमएस तक फूल कर चला जाता है। अब इसे दोबारा से 12 एमएम मोटाई पर लाना संभव नहीं होता। ऐसे में यह मानकों पर खरा नहीं उतरेगा।
शैटरिंग की क्लोज नंबर 6.7 कहती है कि प्लाई तैयार करने के बाद फिल्म चढ़ानी है। जबकि भारत में उपादन प्रक्रिया में एक बार में ही फिल्म चढ़ा दी जाती है। यह उद्योग के लिए समस्या बन सकती है।
शैटरिंग की प्लाई को भी ट्रीटमेंट करने की बात हो रही है। संस्थान या तो इस तरह की तकनीक से हमें अवगत कराए कि कैसे बोर्ड को ट्रीटमेंट के बाद 12 एमएम पर लाया जाए। यदि ऐसा संभव नहीं है तो इसमें छूट दी जाए।
फिल्म की बाध्यता को हटा दिया जाना चाहिए। क्योंकि आने वाला समय यूं भी कलेब्रेडिट प्लाई का है।
डॉ. एमपी सिंह 29 को CED की बैठक है, जिसमें डब्ल्यूटीए इसका सदस्य है। जो सुझाव आपने दिए हैं, वह लिखित में दिए जाए। इसके लिए बीआईएस तक जाने की जरूरत नहीं है। इसमें जो भी बदलाव करना होगा, उचित होगा तो हम यह बदलाव कर सकते हैं।
मनोज ग्वारी
भारतीय मानक ब्यूरो भी लगातार जागरूकता कार्यक्रम कर रहा है। जागरूकता लाने की दिशा में बीआईएस पूरी कोशिश कर रहा है। यदि क्यूसीओ लागू होता है तो बीआईएस की पूरी तैयारी है। उन्होंने इसके लिए अपनी तैयारी पूरी कर ली है।
इसलिए यदि किसी भी मानक में बदलाव करवाना जरूरी समझा जाता है तो इसे बदलने की दिशा में अभी से प्रयास करना होगा।
जबड़े को हम इस्तेमाल कर लिया करते थें, लेकिन नए मानकों में इसे इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा।
एचडीएमआर के लिए तैयार किए जा रहे मानक भी प्लाईवुड के समान ही किया जाना चाहिए।
डब्ल्यूपीसी पर भी विचार किया जाना चाहिए। इसका लाभ कोई और उठाता है। क्योंकि यह लकड़ी नहीं है। वुड प्लास्टिक कंपोजिट, इसमें लकड़ी शून्य है, लेकिन इसके निर्माता इसमें वुड का नाम प्रयोग करते हैं। इससे उपभोक्ता भ्रम में आ जाते हैं। या तो इसमें लकड़ी का नाम लिया जाना बंद करना चाहिए। या फिर इन पर भी मानक लागू होना चाहिए।

एमपी सिंह
इसके लिए सरकार को लिखा जाना चाहिए। पर्यावरण मंत्रालय के तहत इस पर विचार किया जा सकता है। प्लास्टिक होने की वजह से इसे लकड़ी के नाम पर नहीं बेचा जा सकता है। लेकिन इसके लिए उद्योग को पहल करनी होगी। क्योंकि जब तक लिख कर आपत्ति नहीं आएगी तब तक हम भी इस पर कदम नहीं उठा सकते।
सुभाष जोलीः WTA उद्योगपतियों के सुझावों को बीआईएस के सामने रखेगा
इस तरह के वेबिनार उद्योग के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण मौके होते हैं। इससे एक दूसरे के विचार को संाझा करने और समझने का मौका मिलता है। एक दूसरे के साथ ज्ञान बांटा जाता है। यह ऐसा मंच है जहां संस्थान, वैज्ञानिक, उद्योगपति और विशेषज्ञ शामिल होते हैं। यहां रखी गयी बात वहां तक पहुंचती है, जहां पहुंचना जरूरी होता है। जहां से उसका समाधान हो सकता है।
क्यूसीओ को लेकर भी WTA और प्लाई इनसाइट ने कई कार्यक्रम आयोजित किए। हमने कोशिश की है कि हर उद्योगपति को इसके बारे में जागरूक किया जाए। इसमें QCO और प्लाई इनसाइट काफी सफल रहा है।
हमारी एसोसिएशन क्योंकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखती है। इसलिए क्यूसीओ को लेकर उद्योगपतियों के जो सुझाव है, वह WTA की ओर से बीआईएस को भेजे जाएंगे।
जिससे उनका समय रहते समाधान निकल सके।
संस्था की ओर से मनोज ग्वारी व गजेन्द्र राजपुत को नामित किया जाएगा कि वह मानकों को लेकर उद्योगपतियों की समस्याओं को बीआईएस के सामने उठाएं।
उन्होंने कार्यक्रम का समापन करते हुए सभी सम्मानित प्रतिभागियों का धन्यवाद किया।
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