H-1B वीजाः भारतीय आईटी के लिए पूरी तरह बुरी खबर नहीं
- अक्टूबर 1, 2025
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ट्रम्प प्रशासन की योजना के तहत H-1B वीजा लॉटरी सिस्टम में बदलाव कर उसे इस तरह बनाया जा रहा है कि अधिक वेतन पाने वाले आवेदकों को प्राथमिकता दी जाएगी। शुरुआत में यह भारतीय आईटी आउटसोर्सिंग कंपनियों के लिए नुकसानदायक माना गया था, लेकिन हकीकत उतनी नकारात्मक नहीं दिख रही।
शुरुआती विश्लेषण से पता चलता है कि भारतीय आईटी कंपनियां अपने स्टाफिंग मॉडल में बदलाव कर सकती हैं और कुछ मामलों में इससे लाभ भी उठा सकती हैं। इसका कारण यह है कि नए चयन सिस्टम में केवल ऊँची सैलरी ही नहीं, बल्कि कौशल, वरिष्ठता और लोकेशन जैसे कारकों को भी H-1B वीजा आवंटन में महत्व दिया जाएगा।
वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक इंस्टीट्यूट फॉर प्रोग्रेस (IFP) के विश्लेषण में दिखाया गया कि एक अनुभवी एक्यूपंक्चरिस्ट या सोशल वर्कर जो सालाना $40,000 कमाता है, उसे प्राथमिकता रैंकिंग में एक शुरुआती स्तर के AI वैज्ञानिक (जो OpenAI या Anthropic में $280,000 कमाता हो) या यहाँ तक कि एक सर्जन से भी ऊपर रखा जा सकता है।
अध्ययन यह भी बताता है कि बड़े आईटी आउटसोर्सर्स को वास्तव में इससे फायदा हो सकता है और उन्हें लगभग 8 प्रतिशत ज्यादा वीजा मिल सकते हैं। इसकी वजह यह है कि वे अक्सर मिड-कैरियर कर्मचारियों को हायर करते हैं जो उच्च-कौशल वाले रोल्स में तो होते हैं लेकिन अपेक्षाकृत कम वेतन पर। IFP के अनुसार, इन कंपनियों के लगभग 85 प्रतिशत कर्मचारी वेज लेवल II और III में आते हैं, जबकि अन्य कंपनियों में यह अनुपात करीब 60 प्रतिशत है।
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