प्लाईवुड उत्पादन की एक पुस्तिका
- मई 9, 2025
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प्लाइवुड निर्माण में अपने 30 $ वर्षों के लंबे सफ़र के दौरान, असम में छोटे आकार वाली टी-चेस्ट प्लाईवुड से लेकर प्लाईवुड निर्माण तक, मैंने उद्योग में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। लेकिन यह एक तथ्य है कि उत्तर पूर्व में मोटी मोलाई वाली होलोंग और मकाई जैसी परिपक्व वन लकड़ी, यानी से प्लाईवुड का उत्पादन किया जा रहा था।
वह समय था, जब विशाल विनिर्माण क्षमता को कुशल प्रशिक्षित तकनीकी उत्पादन प्रबंधकों द्वारा नियंत्रित किया जाता था। और वे छोटे प्लाईवुड उद्योग के नए तकनीशियनों की सहायता और मार्गदर्शन करने में भी बहुत सहयोगी थे।
1996 में, जब सर्वाच्च न्यायालय ने पूर्वाेत्तर भारत में उत्पादन पर प्रतिबंध लगा दिया, तो दो प्रमुख परिणाम देखे गए। प्लाईवुड निर्माण शुरू में हरियाणा और पंजाब में स्थानांतरित हो गया और फिर धीरे-धीरे भारत के बाकी हिस्सों में चला गया। एक और बड़ा बदलाव यह था कि प्लाईवुड का निर्माण खेत में उगाए गए 6 से 8 साल पुराने पोपलर से सफलतापूर्वक किया जाने लगा, जिसे वास्तव में विमको द्वारा माचिस की डिब्बियों के लिए विकसित किया गया था।
व्यावहारिक रूप से, एक बड़ी चुनौती यह थी कि, गुणवत्ता उत्पादन के लिए पुरानी और अच्छी तरह से स्थापित तकनीकों को, कम परिधि वाली युवा लकड़ी के समुचित उपयोग के लिए, अलग रख दिया गया। सस्ती और लकड़ी की अस्थिर कीमतों ने लकड़ी के सर्वाेत्तम और इष्टतम उपयोग की अवधारणा को खत्म कर दिया, जिसका उद्देश्य केवल लाभ कमाना रह गया। जिसके परिणामस्वरूप, प्लाईवुड निर्माण की शुद्ध नैतिक और वैज्ञानिक प्रक्रिया के सिद्धांत बेमानी हो गए।
इस बीच, उद्योगों की संख्या में बेतहासा वृद्धि हुई, लेकिन तकनीशियनों की नहीं। अधिकतर उद्योग अपने उत्पादन के लिए ठेकेदारों पर निर्भर था, (और अभी भी है) न केवल गुणवत्ता के लिए बल्कि मात्रा के लिए भी, जिनके पास कोई वैज्ञानिक ज्ञान नहीं है।
सकारात्मक रूप से, हम कह सकते हैं कि समय के साथ उद्योग मालिकों सहित नई पीढ़ी ने प्लाईवुड उत्पादन की मूल बातें सीखीं। और उत्पादन प्रक्रिया को कमोबेश सटिकता से पूरी कर रहें हैं। हालांकि, लगभग सभी को दिन-प्रतिदिन की प्रक्रियाओं के वैज्ञानिक तकनीकियों के बारे में पता नहीं है। इसलिए, किसी भी तकनीकी गड़बड़ को केवल उपलब्ध वरिष्ठों के पिछले अनुभव से ही हल कर लिया जाता है।
इसलिए, प्लाईवुड उत्पादन के बुनियादी सिद्धांतों को स्पष्ट करने के लिए एक सरल पुस्तिका की बहुत आवश्यकता थी। डॉ. एस. के. नाथ ने इस कमी को महसूस किया और अपने जीवन भर के अनुभव को । A HANDBOOK OF PLYWOOD PRODUCTION में डालने की कोशिश की। यह पुस्तक हजारों टेक्नोक्रेट और उद्योग मालिकों को प्लाईवुड उत्पादन के बुनियादी सिद्धांतों को समझने और शिक्षित करने में बहुत मदद करेगी, जिससे फ़्लोर सुपरवाइज़र और ठेकेदार की गलतफ़हमियाँ भी दूर होंगी।
हो सकता है, पुस्तक के किसी एक छोटे से बिन्दु, से ही, उत्पादन प्रक्रिया में सुधार/बदलाव करके लाखों की बचत हो जाएं।
सुरेश बाहेती, प्रकाशक
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