भारत में विनिर्माण की कहानी अभी अधूरी
- अप्रैल 9, 2025
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देश में उत्पादन को बढ़ावा देने और ‘चीन प्लस वन’ की वैश्विक रणनीति का फायदा उठाने के लिए राष्ट्रीय विनिर्माण नीति (एनएमपी) और मेक इन इंडिया जैसे कार्यक्रमों से भारत को एक प्रमुख उत्पादन केंद्र बनाने और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में शामिल होने की कोशिसों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में विनिर्माण का योगदान घट रहा है।
निर्यात-आयात की विभिन्न नीतियों और विशेष आर्थिक क्षेत्रों (एसईजेड) के जरिये वस्तुओं के निर्यात को बढ़ावा देने की कोशिश की गई। हालांकि एसईजेड में विनिर्माण और सेवाएं दोनों शामिल हैं।
वास्तव में इन विशेष आर्थिक क्षेत्रों से सेवाओं के निर्यात ने विनिर्माण के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया है। उदाहरण के लिए, एसईजेड के जरिये सेवाओं का निर्यात 50 फीसदी बढ़कर 25.4 अरब डॉलर हो गया जो चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 16.5 अरब डॉलर रहा था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सितंबर 2014 में शुरू किए गए मेक इंडिया कार्यक्रम का उद्देश्य भारत को वैश्विक डिजाइन एवं विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करना था। इसका मुख्य उद्देश्य निवेश के अनुकूल माहौल तैयार करना, नवाचार को प्रोत्साहित करना और विश्वस्तरीय बुनियादी ढ़ाचा स्थापित करना था।
इस कार्यक्रम को 14 विनिर्माण एवं 12 सेवा क्षेत्रों को कवर करते हुए उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना, पीएम गतिशक्ति एवं राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति जैसी प्रमुख योजनाओं और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) जैसे कर सुधारों का समर्थन मिला है। हालांकि पिछले 14 वर्षों के दौरान विनिर्माण की हिस्सेदारी में लगातार गिरावट दर्ज की गई है।
विनिर्माण के गैर-कॉरपोरेट अथवा सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र दबाव में हैं। कोविड के दौरान लॉकडाउन के कारण वे बुरी तरह प्रभावित हुए थे और अभी भी पूरी तरह से उबर नहीं पाए हैं।
निम्न मध्यवर्ग की आय में वृद्धि की रफ्तार सुस्ती रही और उस प्रभाव विनिर्माण पर पड़ा है। निम्न मध्यवर्ग सेवाओं के मुकाबले विनिर्मित वस्तुओं का अधिक उपभोग करता है, जबकि उच्च वर्ग के मामले में यह बिल्कुल विपरित है। यह पिछले एक दशक के दौरान आय वितरण में हुए बदलावों को भी दर्शाता है।
2007-08 तक विनिर्माण क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुई थी। मगर 2008-09 के बाद उसकी रफ्तार कभी दमदार नहीं दिखी।
मेक इन इंडिया कार्यक्रम मुख्य रूप से कम कौशल एवं कम मूल्य वाले विनिर्माण पर केद्रित है, जबकि भारत को इंडोनेशिया, ताइवान, थाईलैंड, वियतनाम और मेक्सिको जैसे देशों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है।
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