चीन की वृद्धि दर और भारत की रफ्तार
- जनवरी 10, 2024
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अधिकांश विशेषज्ञ 2021 तक मानते थे कि 2030 के दशक के मध्य तक चीन अमेरिका को पछाड़कर सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। चीन में दशकों से दो अंकों की आर्थिक वृद्धि हो रही थी और इससे पहले किसी देश ने चीन की तरह तेज उन्नति नहीं की थी। 2006 से 2021 के बीच उसका आकार भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था के 20 फीसदी से बढ़कर उसके 76 फीसदी के बराबर हो गया।
यह सब 2022-23 में बदल गया जब चीन की धीमी वृद्धि, मुद्रा अवमूल्यन और मजबूत अमेरिकी अर्थव्यवस्था के कारण अमेरिका तेजी से आगे निकल गया।
चीन की आबादी घट रही है, उसकी अर्थव्यवस्था बहुत नकदीकृत है और उसका संपत्ति क्षेत्र विफल हो चुका है, जबकि वह उसके जीडीपी के 30 फीसदी के लिए जिम्मेदार रहा है। इन बातों के अलावा बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने चीन में निवेश रोक दिया है और दुनिया भर में चीनी वस्तुओं के खिलाफ व्यापारिक कदम उठाए जा रहे हैं।
तथ्य यह है कि आज भी तमाम प्रगति के बावजूद चीन का आकार प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में अमेरिका के एक बटा पांच से अधिक नहीं है। इसके बावजुद चीन के पास अभी भी संभावनाएं हैं।
चीन की आबादी की उम्र बढ़ रही है लेकिन अभी भी वह दुनिया की सबसे बड़ी श्रमशक्ति है।
वैश्विक विनिर्माण क्षमता में 30 फीसदी हिस्सेदारी और विनिर्मित वस्तुओं के निर्यात में 20 फीसदी की हिस्सेदारी के साथ चीन दुनिया भर में विनिर्माण का पावरहाउस बना हुआ है। अब यह भी सच नहीं है कि चीन का निर्यात बहुराष्ट्रीय कंपनियों के भरोसे है।
चीन में नवाचार की क्षमता भी है। भविष्य की कई तकनीकों के क्षेत्र में चीन ने नेतृत्व किया है, मसलन इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा, 5जी और तेज गति से चलने वाली ट्रेनें। वह विश्वस्तरीय उत्पाद पेश कर रहा है।
विश्व के बाजारों में चीनी उत्पाद नजर आते हैं लेकिन वे थाईलैंड, तुर्किये, वियतनाम तथा अन्य देशों के रास्ते आते हैं। व्यापार बाधाओं के चलते चीन का निर्यात नहीं रुकने वाला है।
इसके अलावा जब हम ऐपल जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अपने विनिर्माण संयंत्र को चीन से बाहर ले जाने की बात करते हैं तो याद रखें कि अगर ऐपल 25 फीसदी आईफोन उत्पादन को भारत ले जाता है तो भी शेष 75 फीसदी चीन में रहेगा। चीन में निर्माण की जो पारिस्थितिकी है उसका अनुकरण करना मुश्किल है।
आगामी दशक में चीन की वृद्धि धीमी हो सकती है, शायद वह कभी जीडीपी के क्षेत्र में अमेरिका को न पछाड़ पाए लेकिन वह शायद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहेगा। वह कई प्रौद्योगिकी में दुनिया का अगुआ भी रहेगा। वह एक ऐसा देश होगा जिसकी अनदेखी कोई नहीं कर सकता है। फिर चाहे वह बहुराष्ट्रीय कंपनियां हों या वैश्विक आवंटक। उभरते बाजार सूचकांक में आज भी चीन की हैसियत भारत से दोगुनी है।
एक अन्य दिलचस्प विचारनीय तथ्य यह है कि भारत को चीन के समक्ष पहुंचने में कितना समय लग सकता है। आज जीडीपी के संदर्भ में भारत का आकार चीन के 20 फीसदी है। चीन 2006 में अमेरिका के सामने इसी स्थिति में था। उसे अमेरिका के जीडीपी के 76 फीसदी के स्तर पर पहुंचने में उसे 15 सालों की असाधारण वृद्धि, मजबूत मुद्रा और अमेरिका के कमजोर प्रदर्शन की जरूरत पड़ी।
हमें चीन की बराबरी करने के लिए वैसा ही कोई चमत्कार करना होगा। क्या एक देश के रूप में हमने उत्पादकता बढ़ाने के लिए उचित कदम उठाए हैं और कारोबारी सुगमता को बढ़ाया है ताकि हम चीन जैसी वृद्धि हासिल कर सकें?




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