भारत में कृषि वानिकी की गतिशीलता
- जुलाई 11, 2025
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पृष्ठभूमि
1970 के दशक में, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के प्रगतिशील किसानों ने यूकेलिप्टस और पोपलर जैसी वृक्षों की खेती शुरू की, और उन्हें पारंपरिक कृषि फसलों की तुलना में अधिक लाभदायक पाया। देहरादून में वन अनुसंधान संस्थान (FRI) द्वारा अनुसंधान और विकास प्रयासों और तत्कालीन उत्तर प्रदेश (अब उत्तराखंड) में WIMCO की स्थापना ने पोपलर की खेती को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कृषि वानिकी के वाणिज्यिक करण के परिणामस्वरूप, इन राज्यों ने में लकड़ी की महत्वपूर्ण मात्रा खेतों की उत्पादन करना शुरू कर दिया, जिसने प्लाईवुड उद्योग को विस्तार दिया। विशेष रूप से, वे अब देश के प्लाईवुड और पैनल उत्पादों में लगभग 60-70 प्रतिशत का योगदान करते हैं, जिससे हरियाणा में यमुना नगर ‘‘भारत की प्लाईवुड राजधानी‘‘ के रूप में उभरा।
हालांकि, भारत वन स्थिति रिपोर्ट (आईएसएफआर) - 2023 के अनुसार, उत्तर प्रदेश में कृषि वानिकी के तहत क्षेत्र 2013 और 2023 के बीच 1.9 लाख हेक्टेयर बढ़ गया, जबकि पंजाब और हरियाणा में यह लगभग स्थिर रहा। ये राज्य अब फसल की पैदावार में ठहराव और घटते जल स्तर का अनुभव कर रहे हैं, जिससे पारंपरिक गेहूं-धान फसल चक्र में विविधता लाने के लिए, वृक्ष फसल की खेती को बढ़ावा देना जरूरी हो गया है।

दक्षिण भारत में, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना ने वाणिज्यिक कृषि वानिकी में अग्रणी भूमिका निभाई है, इसका मुख्य कारण आईटीसी भद्राचलम प्राइवेट लिमिटेड द्वारा क्लोनल वानिकी को बढ़ावा देना है। उनकी इस पहल ने यूकेलिप्टस, कैसुरीना और सुबाबुल जैसी प्रजातियों की खेती को लोकप्रिय बनाया है, जिससे लकड़ी आधारित उद्योग की कच्चे माल की मांग पूरी हुई है और देश भर में वाणिज्यिक कृषि वानिकी को बढ़ावा मिला है। इसके अतिरिक्त, तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय ने मेलिया दुबिया (मालाबार नीम) की खेती को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
वर्तमान स्थिति-क्षेत्र कवरेज
आईएसएफआर- 2023 के अनुसार, भारत का कृषि वानिकी क्षेत्र अनुमानित 128 लाख हेक्टेयर है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 3.9 प्रतिशत है। पिछले दशक (2013-2023) में, कृषि वानिकी के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र में 21 लाख हेक्टेयर की वृद्धि हुई है, जो 20 प्रतिशत की वृद्धि है।
जैसा कि तालिका 1 में दिखाया गया है, कृषि वानिकी क्षेत्र का उच्चतम प्रतिशत पूर्वाेत्तर क्षेत्र (4.9 प्रतिशत ) में दर्ज किया गया है, जबकि मध्य और उत्तरी क्षेत्र राष्ट्रीय औसत से नीचे हैं। इन क्षेत्रों में कम हिस्सेदारी का कारण, उत्तरी भारत में उपजाऊ जमीनों में, कृषि में गहन रूचि और मध्य क्षेत्र में वनाच्छादित भूमि के उच्च अनुपात को दिया जा सकता है।

कृषि वानिकी के अंतर्गत कुल क्षेत्रफल के मामले में शीर्ष तीन राज्य महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश हैं। महाराष्ट्र का ग्रामीण परिदृश्य में बड़े पैमाने पर बागवानी फसले उगाई जाती है; राजस्थान, अपनी शुष्क परिस्थितियों के बावजूद, बागवानी फसलों के साथ-साथ बहुउद्देशीय वृक्ष प्रजातियों की उच्च घनत्व की विशेषता रखता है; और उत्तर प्रदेश यूकेलिप्टस और पोपलर के साथ बागवानी फसलों की व्यापक खेती के लिए जाना जाता है।

बढ़ते स्टाक
आईएसएफआर- 2023 के अनुसार, भारत में कृषि वानिकी के तहत लगभग 829 करोड़ पेड़ हैं, जिनमें कुल बढ़ते स्टॉक की मात्रा 129 करोड़ क्यूबिक मीटर होने का अनुमान है। 2013 और 2023 के बीच, कृषि वानिकी के तहत बढ़ते स्टॉक में 29 करोड़ उक्यूबिक मीटर की वृद्धि हुई, जो 29 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है।
क्षेत्रीय रूप से, देश का दक्षिणी भाग 263 करोड़ कृषि वानिकी पेड़ों के साथ सबसे आगे है, जबकि मध्य क्षेत्र में सबसे कम संख्या है, जहाँ केवल 65 करोड़ पेड़ हैं। सबसे अधिक कृषि वानिकी पेड़ों वाले राज्यों की सूची में महाराष्ट्र सबसे ऊपर है, इसके बाद कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु और केरल हैं।
ISFR- 2023 के अनुसार, कृषि वानिकी के अंतर्गत पेड़ों की संख्या के आधार पर शीर्ष दस प्रजातियाँ हैंः
- मैंगीफेरा इंडिका (आम)
- अजादिराक्टा इंडिका (नीम)
- प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा (मेसकाइट)
- एरेका कैटेचू (एरेका पाम)
- नीलगिरी (सफेदा)
- टेक्टोना ग्रैंडिस (सागौन)
- कोकोस न्यूसीफेरा (नारियल)
- ब्यूटिया मोनोस्पर्मा (ढाक)
- बबूल निलोटिका (कीकर)
- ज़िज़िफस मॉरिटियाना (बेर)
सफेदा और सागौन के बढ़ते रोपण से भारत में औद्योगिक लकड़ी के स्रोत के रूप में उनके बढ़ते महत्व का संकेत मिलता है।
उल्लेखनीय रूप से, सुबाबुल और पोपलर क्रमशः बारहवें और चौबीसवें स्थान पर हैं, जबकि कैसुरीना और मालाबार नीम पेड़ों की संख्या के हिसाब से, कृषि वानिकी में शीर्ष 50 प्रजातियों में नहीं आते हैं।

नीम, ढाक और कीकर जैसी पारंपरिक बहुउद्देशीय प्रजातियाँ अपने लचीलेपन और उपयोगिता के कारण ग्रामीण परिदृश्यों में स्वाभाविक रूप से पाई जाती हैं या व्यापक रूप से लगाई जाती हैं।
इसके अतिरिक्त, चार फल देने वाली प्रजातियाँ- आम, सुपारी, नारियल और बेर- अपनी उच्च लाभप्रदता के कारण लोकप्रियता प्राप्त कर रही हैं। इन प्रजातियों को, भारत की राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत, सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया जाता है और जब ये अनुत्पादक हो जाती हैं, तो लकड़ी के उत्पादन में योगदान देती हैं।
लकड़ी का उत्पादन
आईएसएफआर- 2023 के अनुसार, वनों के बाहर के पेड़ों (टीओएफ) से औद्योगिक लकड़ी का संभावित वार्षिक उत्पादन 915 लाख क्यूबिक मीटर होने का अनुमान है। यह ISFR-2017 में बताए गए औद्योगिक लकड़ी के अनुमानों की तुलना में लगभग 225 लाख क्यूबिक मीटर (30 प्रतिशत) की वृद्धि दर्शाता है। उल्लेखनीय रूप से, यह उत्पादन भारत की कुल औद्योगिक लकड़ी की मांग का लगभग 85 प्रतिशत पूरा करता है।
कृषि वानिकी (TOF) के अंतर्गत कुल क्षेत्रफल का लगभग 42 प्रतिशत है, फिर भी वृक्षों की मात्रा का लगभग 77 प्रतिशत, इसका योगदान है जो लकड़ी के उत्पादन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है। यह उच्च योगदान मुख्य रूप से वाणिज्यिक वृक्ष फसलों और बांस के झुरमुटों की कटाई के छोटे चक्रों के कारण है, जो आमतौर पर कृषि वानिकी प्रणालियों में उगाए जाते हैं, जो उन्हें अन्य ज्व्थ् क्षेत्रों की तुलना में अधिक उत्पादक और कुशल बनाते हैं।
मुख्य अनुशंसाएँ (MoEFCC)
भारत में कृषि वानिकी क्षेत्र को और मजबूत करने के लिए, निम्नलिखित सिफारिशें प्रस्तावित हैः
- वाणिज्यिक वृक्ष प्रजातियों के लिए रोपण स्टॉक में सुधार
व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली वाणिज्यिक प्रजातियों जैसे कि यूक्लिप्टस, पोपलर, कैसुरीना, सुबाबुल, मालाबार नीम, सागौन, ऑरिकुलीफॉर्मिस, ऐलेन्थस, शीशम, सिल्वर ओक और बकैन के लिए रोपण सामग्री में निरंतर सुधार आवश्यक है।
इसमें उच्च उपज देने वाली, रोग प्रतिरोधी और सूखा सहिष्णु किस्मों या क्लोनों का विकास शामिल है। इन प्रजातियों की उत्पादकता बढ़ाने से लकड़ी आधारित उद्योगों की कच्चे माल की जरूरतों को पूरा करने और लकड़ी के आयात पर देश की निर्भरता को कम करने में मदद मिलेगी।

- बहुउद्देशीय वृक्ष प्रजातियों (एमपीटी) का संवर्धन
नीम, ढाक, कीकर, रोंज, भीमल, देसी पापड़ी, महुआ, बादाम पापड़ी, जांड, जामुन, इमली और अर्जुन जैसी पारंपरिक बहुउद्देशीय वृक्ष प्रजातियों की उत्पादकता में सुधार किया जाना चाहिए। इससे गैर-लकड़ी वन उत्पादों (एनटीएफपी) की पैदावार बढ़ सकती है, उनके वाणिज्यिक उपयोग को बढ़ावा मिल सकता है और ग्रामीण आजीविका में वृद्धि हो सकती है। इन प्रजातियों को बढ़ावा देने से कृषि वानिकी प्रणालियों के भीतर पारिस्थितिक और आर्थिक लाभों के एकीकरण का भी समर्थन होता है।
- आक्रामक प्रजातियों का प्रबंधन
मेस्काइट का तेजी से प्रसार, जो 2023 में कृषि वानिकी प्रजातियों में तीसरे स्थान पर है, एक बढ़ती चिंता का विषय है। जबकि यह मुफ़्त ईंधन के स्रोत के रूप में कार्य करता है और खारे या क्षारीय मिट्टी में पनपता है, अनुपयुक्त क्षेत्रों में इसका अनियंत्रित विस्तार हानिकारक है। पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों से लक्षित उन्मूलन आवश्यक है, साथ ही खराब या समस्याग्रस्त भूमि पर इसका विनियमित उपयोग जहां यह देशी पारिस्थितिकी प्रणालियों को नुकसान पहुँचाए बिना लाभ प्रदान कर सकता है।
निष्कर्ष
लकड़ी, गैर-लकड़ी वन उत्पादों और औद्योगिक कच्चे माल की बढ़ती घरेलू मांग को पूरा करने के लिए कृषि वानिकी क्षेत्र का विकास महत्वपूर्ण है।
एक मजबूत कृषि वानिकी रणनीति किसानों की आय बढ़ाएगी, रोजगार के अवसर पैदा करेगी और जलवायु परिवर्तन शमन, भूजल पुनर्भरण और प्राकृतिक वनों के संरक्षण में योगदान देगी।
इसके अलावा, यह लकड़ी के आयात को कम करके विदेशी मुद्रा के संरक्षण में मदद कर सकता है और कर संग्रह में वृद्धि के माध्यम से सरकारी राजस्व को बढ़ा सकता है। कृषि वानिकी को बढ़ावा देना पारिस्थितिक स्थिरता और दीर्घकालिक पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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