सरकार की नवंबर 2024 की मासिक आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि ‘वैश्विक अनिश्चितताओं, जरूरत से अधिक उत्पादन और देसी बाजार में विदेशी सस्ता माल छाने के डर से निजी पूंजीगत व्यय में कमजोरी दिखी है’। इन समस्याओं का समाधान चुटकी बजाकर नहीं किया जा सकता।

पिछले तिमाही में आर्थिक सुस्ती के कई कारण सरकार ने बताए हैं। पहला कारण भारतीय रिजर्व बैंक की सख्त मौद्रिक नीति है तो दूसरा कारण आम चुनाव एंव विधानसभा चुनावों के कारण केंद्र एंव राज्य सरकारोे द्वारा कम पूंजीगत व्यय बताया गया हैै। तीसरा कारण देश के भीतर राजनीतिक कारणों, वैश्विक अनिश्चितता, अत्यधिक क्षमता और भारत में विदेशी माल पाटे जाने के डर से सुस्त निजी पूंजीगत व्यय।

भारतीय अर्थव्यवस्था मोटे तौर पर एक गति में आगे बढ़ती रही है और इसमें साधारण वृद्धि ही हुई है। हमारी वृद्धि दूसरे कई देशों से तेज हो सकती है मगर इतनी नहीं है कि भारत को मध्यम आय वाला देश बना सके।

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छोटी भारतीय कंपनियों के लगातार मजबूत प्रदर्शन करने की एक वजह है। वित्त वर्ष 2023 की अंतिम तिमाही से ही उन्हेें सरकार के भारी-भरकम खर्च का भरपूर फायदा मिला है। पिछले कई वर्षों की सुस्त आर्थिक वृद्धि को देखते हुए मोदी सरकार ने रेल, सड़क, शहरी परिवहन, जल, ऊर्जा परिवर्तन और रक्षा उत्पादन जैसे बुनियादी ढ़ाचे पर सालाना लगभग 11 लाख करोड़ रूपये खर्च कर अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने की कोशिश की।

उम्मीद की जा रही है कि चालू वित्त की आखिरी तिमाही में सरकार का पूंजीगत व्यय तेजी से बढ़ जाएगा। मगर सरकार के पूंजीगत व्यय के भरोसे बैठे रहने का अपना जोखिम है क्योंकि यह काफी हद तक राजस्व के आंकडे­ पर निर्भर करता है, जो कमजोर दिख रहा है।


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