नीति निर्माता और प्रशासक देश के निर्यात को बढ़ाने के लिए जितनी ऊर्जा लगा रहे हैं और जिस रूचि का प्रदर्शन कर रहे हैं, ऐसा माना जा सकता है कि इस प्रयास की वजह देश के वाणिज्यिक निर्यात में हाल के समय में आई गिरावट है। पिछले महीने यह दो वर्षों के अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया। ऐसे में एक लक्षित निर्यात नीति को जरूरी माना जा रहा है।

सरकार को सुधार के अपने ऐजेंडे पर आगे बढ़ना और आधुनिक व्यापार की प्रकृति को ध्यान में रखकर चलना होगा। बिना व्यापार संतुलन के निर्यात बढ़ाने का विचार पुराना हो चुका है। अगर निर्यात बढ़ाना है तो संभावित विदेशी साझेदारों को भारतीय बाजार में पहुंचने देना होगा।

ऐसे में इन क्षेत्रो को निर्यात बढ़ाने का सवाल किफायत, प्रतिस्पर्धी क्षमता और लागत में कमी पर निर्भर करता है। प्रतिस्पर्धी क्षमता बढ़ाने के लिए भारत को वैश्विक मूल्य श्रृंखला में शामिल होना होगा।

उसके लिए स्थिर व्यापार और कर नीति की आवश्यकता है। देश में करों और टैरिफ को लेकर परिवर्तनशीलता ने वैश्विक मूल्य श्रृंखला में भारत के प्रवेश को बाधित किया है। ऐसे में निर्यात बढ़ाने की उसकी क्षमता भी प्रभावित हुई है।

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यकीनन कारोबारी मित्रता के लिए प्रशासनिक से लेकर न्यायिक सुधारो तक जमीनी सुधार भी जरूरी हैं। परंतु खास तौर पर व्यापार के लिए नए समझौतों पर तथा अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता पर सरकार की नीति स्पष्ट होनी चाहिए। बुनियादी बातों पर ध्यान देने की जरूरत है, व्यापार नीति सुधार लंबे समय से लंबित हैं। इस दिशा में हाल ही के दिनों में जो काम किया गया है वह लक्ष्य तय करने अथवा खास कंपनियों मसलन ऐपल आदि को लुभाने का रहा है। यह टिकाऊ साबित हो भी सकता है और नही भी।

निर्यात में इजाफा करने का इकलौता तरीका यही है कि कोई भी कंपनी चाहे वह छोटी हो या बड़ी, उसे न्यूनतम नियामकीय या प्रशासनिक हस्तक्षेप के साथ वैश्विक कच्चे माल और वैश्विक बाजारों तक पहुंच मिल सके।

यह समझ देश की व्यापार नीति की बुनियाद को बदल देगी और निर्यात को एक स्थायी ऊंचाई प्रदान करेगी।


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