हालांकि वनों में चिंताजनक कमी का सबसे बड़ा कारण चौतरफा विकास को माना जाएगा, लेकिन यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि भारत में कटने वाले वनों की भरपाई के लिए पौधरोपण की नीतियां लागू हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि ये नीतियां कितनी कारगर रही हैं?

प्रतिपूरक पौधरोपण प्रतिपूरक पौधरोपण निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (कैम्पा) के अनुसार यदि वन भूमि को अन्य उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता है तो उसके बदले उतनी ही भूमि पर पौधरोपण किया जाता है। इसमें वन भूमि के अलावा दूसरी जमीन राज्य वन विभाग को सौंपी जाती है। प्रतिपूरक वनीकरण का लक्ष्य विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना है।

कैम्पा में विभिन्न क्षेत्रों से योगदान आता है, जिससे भारत की विकास प्राथमिकताओं का पता चलता है। बुनियादी ढ़ाचा निर्माण से जुड़ी एजेंसियां इसमें सबसे आगे हैं। खनन और विनिर्माण से लेकर पाइपलाइन एवं नहरों का प्रबंधन करने वाले जल प्राधिकरणों समेत औद्योगिक इकाइयां भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। शहरी विकास एजेंसियां और तेल-गैस कंपनियों जैसी अहम सस्थाएं वन संरक्षण से जुड़ी इस निधि को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाती हैं।

वर्ष 2013 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएपी) के ऑडिट में कई खामियां उजागर हुई थीं। प्रबंधन के स्तर पर इसमें गंभीर खामियां मिली थी सीएजी की रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि वर्ष 2006 से 2012 तक वनीकरण के लिए चिह्नित कुल भूमि में से केवल 27 प्रतिशत ही सौंपी गई। इसमें भी केवल 7 प्रतिशत पर ही पौधरोपण किया गया।

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रिपोर्ट में वित्तीय गड़बड़ियां भी सामने आई थीं जैसे बड़ी मात्रा में निधि और संबंधित खर्चांे का कहीं हिसाब ही नहीं मिला। परियोजनाओं की वास्तविक स्थिति की निगरानी के लिए बनाई गई ई-ग्रीन वॉच प्रणाली काम ही नहीं कर रही थी। इसे लागू करने की कमजोर प्रक्रिया के कारण अवैध खनन और अतिक्रमण को बढ़ावा मिला।

कई राज्यों ने प्रतिपूरक वनीकरण योजना का 50 प्रतिशत लक्ष्य भी पूरा नहीं किया। बिहार, दिल्ली, मिजोरम तथा नागालैंड जैसे राज्य तो बिल्कुल फिसड्डी रहे। रिपोर्ट में यह भी पता चला कि केवल 7 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों-उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, जम्मू-कश्मीर दिल्ली और हरियाणा में ही वनीकरण के रिकॉर्ड के लिए अलग वेबसाइट हैं।

 भूमि का उपयोग बदलने और कैम्पा गतिविधियों के लिए निधि उपयोग जैसे मामलों की पड़ताल से पता चला कि ई-ग्रीन वॉच, परिवेश पोर्टल, एनुअल प्लान ऑफ एक्शन (एपीओ), वार्षिक रिपोर्ट तथा निगरानी एवं मूल्यांकन दस्तावेज आदि के आंकड़े आपस में बिल्कुल मेल नहीं खाते।

जमीन उपलब्ध नहीं होना और छोटे टुकड़ों में होना, निधि का खराब तरीके से इस्तेमाल होना और रिकार्ड को सहेजकर नहीं रखना जैसी चुनौतियां भी सामने आईं। इसके अलावा डेटा संकलन की कई पहल किए जाने के बाद भी ज्यादातर डेटा पुराना था, इस्तेमाल लायक नहीं था या उपलब्ध ही नहीं था।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि प्रतिपूरक वनीकरण परियोजनाओं की हालत बहुत अच्छी नहीं है। इसमें अधिक पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही के साथ आमूल-चूल परिवर्तन होना चाहिए। उसके बाद ही पारिस्थिक संरक्षण के प्रति उचित संवेदना के साथ भारत की तेज वृद्धि की महत्वाकांक्षा पूरी हो सकेगी।


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