पश्चिम एशिया में छिड़ी जंग का असर अब भारत की फैक्टरियों पर भी नजर आने लगा है। बड़ी विनिर्माण कंपनियों से लेकर सूक्ष्म, लघु और मझोले उपक्रमों तक तमाम कंपनियां उत्पादन के मामले में बहुत अधिक संघर्ष कर रही हैं। कुछ को जहां ईंधन में कमी और कच्चे माल के कार्गों में देरी के कारण उत्पादन में गिरावट का सामना करना पड़ रहा है, वहीं कई अन्य कारोबारी कर्मचारियों के लिए भोजन तक नहीं जुटा पा रहे हैं।

उद्योग जगत के सूत्रों का कहना है कि गैस पर निर्भर कई इकाइयों ने युद्ध से पहले की तुलना में उत्पादन को 30 प्रतिशत तक कम कर दिया है।

वैश्विक नौवहन मार्गों में व्यवधान के कारण जहाजों का मार्ग बदलना, लंबी ट्रांजिट अवधि और कार्गा में देरी हो रही है, जिससे आपूर्ति श्रृंखला और मार्जिन पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।

उद्योग जगत सराहना करता हैं कि सरकार इस मामले को पूरी तरह समझ रही है और महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए ईंधन आवंटन को सक्रिय रूप से प्राथमिकता दे रही है। औद्योगिक प्रोपेन/एलपीजी और प्राकृतिक गैस के लिए आवंटन प्रतिशत पर स्पष्टता, साथ ही नियमित आपूर्ति का आश्वासन, संचालन की योजना बनाने और उन्हें अनुकूलित करने में महत्त्वपूर्ण होगा। यदि स्पष्टता नहीं होती है, तो पूरे उद्योग में एक का दूसरे पर प्रभाव पड़ेगा, जिसकी गंभीरता इस बात पर निर्भर करेगी कि ये मुद्दे कितनी जल्दी हल होते हैं।

रेस्तरा, कैंटिनों को गैस उपयोग को कम करने और मेन्यू को सरल बनाने का निर्देश दिया गया है। लंबे समय तक पकाने या भारी तलने वाले आइटमों को अस्थायी रूप से कम कर दिया गया है। यदि आपूर्ति की स्थिति अगले कुछ दिनों में बेहतर नहीं होती है, तो वैकल्पिक व्यवस्थाओं की तलाश करनी पड़ सकती है।

अधिकांश मामलों में, फैक्टरी इकाइयों की कैंटीनें अब लकड़ी, कोयला और बिजली का सहारा ले रही हैं। संकट जारी रहे या न रहे, कंपनियां संकेत दे रही हैं कि वे भविष्य में ईंधन की कमी के लिए हमेशा एक वैकल्पिक योजना तैयार रखेंगी। दिल्ली क्षेत्र में भी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने एक महीने के लिए छूट देते हुए, रोक लगाए गए ईंधनों के उपयोग की मंजूरी दी हैं।

पेनल उद्योग में परिवहन लागत के साथ-साथ विभिन्न रसायनों में तेजी से उत्पादन खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है।

महंगाई की अनिश्चितता को देखते हुए, बाजार में खरीदारी पर असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है। जनता द्वारा सिर्फ आवश्यक वस्तुओं पर ध्यान देने की वजह से, पेनल उत्पादों की मांग कमजोर रहने की चिंता बनी हुए है, जो उत्पादकों को मूल्य वृ़द्धि पर नियंत्रण रखने को मजबूर करेगी।


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