पिछले 15 वर्षों से आम भारतीयों की आय स्थिर है। ये आबादी के शीर्ष 15% से 50% के बीच के लोग हैं। सबसे गरीब 20% लोगों की आय में बढ़ती सब्सिडी और दूसरी सौगातों के कारण वृद्धि देखी जा रही है।

लेकिन 18 से 35 वर्ष के बीच के 12 करोड़ से अधिक लोग न तो शिक्षा ले रहे हैं और न ही रोजगार की तलाश कर रहे हैं।

कृषि में ‘रोजगार’ करने वाली आबादी अपने उच्चतम स्तर पर है, जबकि जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा 30 वर्षों में सबसे निचले स्तर पर है।

उत्पादन का डिफॉल्ट तरीका अनौपचारिक और असंगठित क्षेत्र बना हुआ है।

हमारे लड़खड़ाते आर्थिक इंजन के चार मायने हैं। एक, शेयर बाजार की कहानी भारत की समृद्धि की कहानी नहीं है। हाल के दिनों में शेयर बाजार में संरचनात्मक मंदी के बावजूद उछाल आया है, क्योंकि सूचीबद्ध कम्पनियों के कुल राजस्व के अनुपात में उनके मुनाफे का हिस्सा बढ़ा है, जबकिर:

  • वास्तविक वेतन स्थिर हैं या घट रहे हैं,
  • आपूर्तिकर्ताओं के मार्जिन कम हो गए हैं
  • कम्पनियों ने कर्ज-मुक्त होने के लिए करों में छूट और प्रोत्साहन का उपयोग किया है।

जिसके कारण निवेश कम होने के बावजूद मुनाफा ज्यादा है। निकट भविष्य में भी यही हालात रहने की उम्मीद की जा सकती है, उलटे बाहरी झटकों के कारण और अस्थिरता आएगी।

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आम आदमी के आवास पर सब्सिडी दी जाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारत उत्पादकता के चौंकाने वाले निम्न स्तर से ग्रस्त है। कम उत्पादकता के कारण आम भारतीयों की मांग को पूरा करने में असमर्थ है। अधिकांश उद्यमियों का लक्ष्य ‘रेंट-सीकिंग’ हो गया है यानी नीतियों-संसाधनों के दोहन से अपनी सम्पत्ति को बढ़ाना।

अनौपचारिक क्षेत्र अपनी पकड़ बनाए हुए है। एक समृद्ध अर्थव्यवस्था वह होती है, जिसमें लोग अनौपचारिक क्षेत्र में उत्पादित सस्ते, निम्न-गुणवत्ता वाले उत्पादों का उपभोग करने से हटकर औपचारिक अर्थव्यवस्था में उत्पादित बेहतर-गुणवत्ता वाले सामान का उपभोग करते हैं।

1991 के बाद से ही राज्यसत्ता हमेशा मुआवजा देने वाले की स्थिति में बनी हुई हैं। यहां निराश्रितों को सब्सिडी दी जाती है, लेकिन आम लोग भी भोजन, परिवहन, आवास और जरूरी चीजों के लिए भारी सरकारी सब्सिडी के बिना अपनी कमाई से आवश्यक वस्तुएं खरीदने में सक्षम नहीं हैं।

यही कारण है कि सार्वजनिक निवेश और गुणवत्तापूर्ण सामान देने की क्षमता घुट जाती है, क्योंकि राज्यसत्ता व्यापक समृद्धि लाने में अपनी विफलता के ऐवज में सब्सिडी और सौगातों की भरपाई करती रहती है।

ये तमाम एक मध्यम आय वाले देश के संकेत हैं। यह विशेष रूप से चिंता का विषय है कि ये प्रति व्यक्ति आय के इतने कम स्तर पर भारतीय अर्थव्यवस्था की विशेषता बन चुके हैं। लेकिन स्थिति चाहे जितनी गम्भीर हो, वह सुधार योग्य है।


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