भारत की विनिर्माण वास्तविकता
- फ़रवरी 7, 2025
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राष्ट्रीय विनिर्माण नीति (एनएमपी) और मेक इन इंडिया जैसी पहलों के बावजूद, विनिर्माण में उत्पादन और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का केंद्र बनने के बजाय भारत की अर्थव्यवस्था में गिरावट आ रही है।
विभिन्न निर्यात-आयात (एक्जिम) नीतियों और विशेष आर्थिक क्षेत्रों (एसईजेड) के माध्यम से व्यापारिक निर्यात बढ़ाने के प्रयास किए गए, हालांकि एसईजेड में सेवाएं और विनिर्माण दोनों शामिल हैं वास्तव में, इन क्षेत्रों में सेवाओं के निर्यात ने विनिर्माण को पीछे छोड़ दिया है। उदाहरण के लिए, चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के दौरान विनिर्माण के लिए एसईजेड के माध्यम से सेवा निर्यात 50 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 25.4 बिलियन डॉलर हो गया।
सितंबर 2014 में शुरू की गई मेक इन इंडिया पहल का उद्देश्य भारत को वैश्विक डिजाइन और विनिर्माण केंद्र में बदलना था। इसका मुख्य उद्देश्य नवाचार को प्रोत्साहित करना और विश्व स्तरीय बुनियादी ढाँचा विकसित करना है।
हालांकि, पिछले 14 वर्षों में यह हिस्सा घट रहा है। पिछले नौ वर्षों में विनिर्माण में वॉल्यूम वृद्धि औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) से भी नीचे रही है।
विनिर्माण के गैर-कॉर्पारेट या सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) खंड तनाव में हैं। कोविड के दौरान लॉकडाउन से वे बुरी तरह प्रभावित हुए और अभी भी पूरी तरह से उबर नहीं पाए हैं।
निम्न मध्यवर्ग की आय में वृद्धि की रफ्तार सुस्ती रही और उस प्रभाव विनिर्माण पर पड़ा है। निम्न मध्यवर्ग सेवाओं के मुकाबले विनिर्मित वस्तुओं का अधिक उपभोग करता है, जबकि उच्च वर्ग के मामले में यह बिल्कुल विपरित है। यह पिछले एक दशक के दौरान आय वितरण में हुए बदलावों को भी दर्शाता है।
2007-08 तक विनिर्माण में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, लेकिन 2008-09 के वैश्विक वित्तीय संकट ने इसे बुरी तरह प्रभावित किया और तब से यह मजबूत गति हासिल नहीं कर पाया है।
मेक इन इंडिया अभियान में मुख्य रूप से भारत को इंडोनेशिया, ताइवान, थाईलैंड, वियतनाम और मैक्सिको जैसे देशों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा और चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
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