देश के शहरों में किफायती आवास की स्थिति बदतर होती जा रही है। हाल के वर्षों में किफायती श्रेणी के मकानों की मांग काफी कम हुई है क्योंकि इनका संभावित खरीदार वर्ग महामारी से बहुत बुरी तरह प्रभावित हुआ। इसके अलावा आवास ऋण की ब्याज दरों और आवासीय कीमतों में भारी इजाफे ने भी कम आय वाले परिवारों के लिए हालात मुश्किल बना दिए हैं।

महामारी के कारण व्याप्त निराशा और निर्माण तथा श्रमिकों की बढ़ती लागत ने अचल संपत्ति डेवलपरों को विवश किया कि वे अपना ध्यान किफायती मकानों से दूर प्रीमियम और लक्जरी श्रेणी के मकानों पर लगाएं। इन कारणों से मांग और आपूर्ति का अंतर उत्पन्न हो गया है जो किफायती आवासीय इकाइयों को प्रभावित कर रहा है।

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बढ़ते शहरीकरण, आय के स्तर में बेहतरी और अर्थव्यवस्था के औपचारिक होने जैसे सकारात्मक घटनाक्रम के बावजूद ऐसा हो रहा है। जबकि ये कारण आवास बाजार को मजबूत बनाने वाले हैं। हाल के वर्षों में किफायती श्रेणी के आवास की कीमतों में भी भारी बढ़ोतरी हुई है जिसने समस्या को और गंभीर बना दिया है। परियोजनाओं का वित्तीय दृष्टि से अव्यावहारिक होना, किफायती जमीन की उपलब्धता की कमी और डेवलपरों एवं संभावित खरीदार दोनों की ऋण पर अत्यधिक निर्भरता भी बाधा है।

मकानों की ऊंची कीमतें अर्थव्यवस्था पर बोझ हैं। इससे शहरी इलाकों में काम करने वालों के वेतन का प्रीमियम खत्म होता है और नियोक्ताओं के लिए प्रतिभाओं को अपने साथ बनाए रखना मुश्किल होता है। इस संदर्भ में आवास बाजार के संचालन में मजबूत योजना का इस्तेमाल करने की आवश्यकता है।


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