रोजगार पैदा करने वाले उत्पादों के पक्ष में हो राजनीतिक आर्थिक बदलाव
- अगस्त 8, 2024
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यह विश्वास कमजोर पड़ रहा है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की ऊंची वृद्धि दर से रोजगार के अधिक अवसर पैदा होते हैं। हमारी जीडीपी वृद्धि दर ऊंची रही है लेकिन रोजगार में अपेक्षित वृद्धि देखने को नहीं मिली। अब हमें रोजगार पैदा करने पर ध्यान देना होगा जिसके फलस्वरूप जीडीपी वृद्धि हो।
इसके लिए हमें अपनी मानसिकता में बुनियादी बदलाव करना होगा। जिसे हमने 1991 के आर्थिक सुधारों के साथ अपनाया था। उसके मुताबिक राज्य को वृहद आर्थिक मोर्च पर अपनी भूमिका सीमित करनी चाहिए। सरकार को चाहिए कि काम के लिए उचित परिवेश उपलब्ध कराए। ऐसे में मुक्त बाजार स्वंय अपना काम करेगा।
चीन से तुलना करने पर पता चलता है कि इस स्थिति में हम कहां खड़े हैं। सन 1991 में हम प्रति व्यक्ति आय और तकनीक के मामले में बराबरी की स्थिति में थे। अब वह हमसे पांच गुना बड़ा है। बाजार पर काबू करने की बजाय चीन की सरकार ने औद्योगीकरण को गति दी और निर्यात में कामयाबी हासिल करते हुए चीन को दुनिया की फैक्टरी बना दिया। चीन ने दक्षिण कोरिया और जापान की उन नीतियों का अनुसरण किया जो पहले उन देशों को कामयाबी दिला चुकी थीं। बल्कि उनसे सीखते हुए और भी बेहतर किया।
सबसे पहले वास्तविक विनिमय दर, जिसे उतनी तवज्जो नहीं मिलती है जितनी मिलनी चाहिए। दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों के बीच इस बात को लेकर सहमति रही है कि वास्तविक विनिमय दर में इजाफे का घरेलू मूल्यवर्धन और रोजगार सृजन पर विपरीत प्रभाव हुआ है। हमारे देश में वास्तविक विनिमय दर में इजाफा हुआ है, जबकि उत्पादकता और निर्यात में इजाफा नहीं हुआ है।
अब बदलाव का वक्त आ गया है कि रिजर्व बैंक को बाजार में हस्तक्षेप करने दिया जाए ताकि वास्तविक विनिमय दर में इजाफा रोका जा सके। पूर्वी एशियाई देशों ने तेज औद्योगीकरण के लिए कृत्रिम ढंग से मुद्रा अवमूल्यन किया।
दूसरा है कारोबार की लागत कम करना। हमारे यहां लॉजिस्टिक की लागत प्रतिद्वंद्वी देशों की तुलना में 50 फीसदी तक अधिक है। आदर्श स्थिति में डीजल को वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी के न्यूनतम या मध्यम स्लैब में होना चाहिए लेकिन इस पर जीएसटी की उच्चतम दर से भी करीब दोगुना कर लगता है। कारोबारी लागत कम करना कारोबारी सुगमता से अधिक बड़ी प्राथमिकता है। असल संकट कम करने के लिए निजी निवेश जुटाकर रोजगार तैयार करने होंगे क्योंकि सरकारी रिक्तियों की पूर्ति से बात नहीं बनेगी।
हमें बेहतर क्षेत्रवार नीतियों की आवश्यकता होगी। सबसे पहले हमें विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों में श्रम आधारित उद्योगों की पहचान करनी होगी क्योंकि हमें इन क्षेत्रों में वैश्विक बाजारों के प्रमुख कारोबारियों की तुलना में वेतन के मामले में बढ़त हासिल है। हमें प्रतिस्पर्धी बढ़त की पुरानी मान्यता को त्यागना होगा।
घरेलू बाजार और निर्यात में सफलता को साथ चलना होगा क्योंकि हम वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं। संरक्षणवादी और बंद अर्थव्यवस्था की ओर लौटने की न तो आवश्यकता है और न ही यह कोई विकल्प है।
रोजगार तैयार करने वाले उत्पादकों के पक्ष में राजनीतिक-आर्थिक बदलाव आवश्यक है। उनके हितों को व्यापारियों और उपभोक्ताओं के हितों पर प्राथमिकता देकर ही रोजगार सृजन में कामयाबी पाई जा सकती है।




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