भारत अपने बाजारों को लगातार खोलता जा रहा है, जिसके साथ अधिक विश्वास भरी, कम प्रतिक्रिया वाली तथा ज्यादा सक्रिय अयात नीति व्यवस्था की शुरुआत हो रही है। इस बदलाव ने पिछले बजट के बाद गति पकड़ी और अब मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) की संभावना ने इसे और तेज किया।

जब किसी उत्पाद पर क्यूसीओ लागू किया जाता है तो घरेलू और वैश्विक, छोटे और बड़े, नए और पुराने सभी विक्रेताओं को गुणवत्ता मानकों का पालन करना होता है। आम तौर पर नए, छोटे और अंतरराष्ट्रीय उपक्रमों को इनका ज्यादा खमियाजा भुगतना पड़ता है मगर अंत में इसका असर भारतीय उपभोक्ताओं पर ही पड़ता है।

भारत के क्यूसीओ की बात करें तो इन्हें लागू करने में परीक्षण और मूल्यांकन की लागत, प्रमाणन की जरूरत, अस्पष्ट या अनुचित विनिर्देश, जटिल मूल्यांकन प्रक्रिया, सुविधाओं और कर्मचारियों की किल्लत, विलंब आदि की समस्या हैं।

ध्यान रहे कि छोटे उपक्रम अक्सर अधिक प्रभावित होते हैं क्योंकि वे किसी एक उत्पाद पर अधिक निर्भर होते हैं, और उन्हें अपने आकार से अधिक लागत का भार वहन करना पड़ता है। इससे कारोबारी सुगमता घटती है।

ऐसे में क्यूसीओ लागू ही क्यों किए जाते हैं? इसकी मुख्य वजह होती हैं सस्ते और घटिया उत्पादों को रोकने के लिए ही सरकार न्यूनतम स्वीकार्य गुणवत्ता मानक लागू करती है ताकि बाजार में बेहतर गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सके।

परंतु यहां एक दिलचस्प बात हैः गतिशील, बढ़ती अर्थव्यवस्था में मुल्य और गुणवत्ता के जोड़ का समीकरण सभी उत्पादों और बाजार क्षेत्रों में होना चाहिए। मंझे हुए बाजार में कम गुणवत्ता वाली वस्तुएं भी उतनी ही अहम होती हैं जितनी बेहतर गुणवत्ता वाली। यह विविधता विनिर्माण को लचीला बनाती है, नवाचार में सहायता करती है, जिससे ग्राहकों के सामने कई विकल्प आ जाते हैं और समावेशन भी होता है।

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किसी भी बाजार में खरीदार और विक्रेता दोनों गुणवत्ता का फर्क पहचान सकते हैं। अगर वे खरीदने से पहले गुणवत्ता परख नहीं पाते तो भी एक बार घटिया सामान आ जाने पर विक्रेता की साख और बिक्री पर असर जरूर पड़ता है।

भारत में क्यूसीओ लागू करने की एक और वजह है। यह वजह है किसी क्षेत्र को आयात से बचाना। भारत ने ज्यादातर क्यूसीओ उन्ही उत्पाद श्रेणियों में लगाए है, जहां बहुत आयात हो रहा है।

आम तौर पर संरक्षणवाद के विभिन्न स्वरूपों का उपयोग कमजोर और छोटे उपक्रमों को बचाने में होता है। लेकिन कई बार क्यूसीओ से बड़ी कंपनियां तो बचा ली जा रही हैं मगर असर छोटी कंपनियां और उपभोक्ता झेल रहे हैं।

जरूरी नहीं कि यह प्रवृत्ति जानबूझकर अपनाई गई हो बल्कि उद्योग को राजनीतिक अर्थव्यवस्था के कारण भी ऐसा हो सकता है। बड़ी कंपनियों के पास हमेशा छोटी कंपनियों की तुलना में बेहतर संसाधन होते हैं।

अब जबकि भारत एक परिपक्व अर्थव्यवस्था और विनिर्माण केंद्र के रूप में तैयार हो रहा है तो नीतिगत उपायों का भी सोच-समझकर इस्तेमाल करना होगा।


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