वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की भारत की महत्वाकांक्षा देश के औद्योगिक और लॉजिस्टिक्स रियल एस्टेट बाजार को तेज़ी से बदल रही है। विनिर्माता कंपनियाँ अब ऑटोमेशन, आधुनिक उत्पादन प्रक्रियाओं और पूंजी-कुशल विस्तार को समर्थन देने वाली उन्नत, अनुपालन-आधारित और भविष्य-तैयार ग्रेड-ए सुविधाओं की मांग कर रही हैं।

औद्योगिक और लॉजिस्टिक्स स्पेस की लीज़िंग में विनिर्माण क्षेत्र सबसे बड़ा मांग चालक बनकर उभरा है। भारत के शीर्ष आठ शहरों में लाइट मैन्युफैक्चरिंग स्पेस की लीज़िंग 2020 में 3.2 मिलियन वर्ग फुट से बढ़कर 2024 में 22.1 मिलियन वर्ग फुट हो गई है। 2025 में इसके 25.4 मिलियन वर्ग फुट तक पहुँचने और 2027 तक लगभग 34 मिलियन वर्ग फुट होने का अनुमान है, जो कुल अवशोषण का लगभग आधा हिस्सा होगा।

ऑटोमेशन, स्थिरता मानकों, बेहतर बुनियादी ढांचे और नियामकीय अनुपालन को संभालने की क्षमता के कारण ग्रेड-ए सुविधाओं को प्राथमिकता दी जा रही है। इसी बदलाव को दर्शाते हुए, कुल विनिर्माण लीज़िंग में ग्रेड-ए स्पेस की हिस्सेदारी 2019 में 70 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 82 प्रतिशत हो गई है और 2025 की तीसरी तिमाही तक यह 87 प्रतिशत तक पहुँच गई है।

डेवलपर्स भी इस रुझान के अनुरूप उच्च-विशिष्टताओं, ऑटोमेशन-तैयार और ग्रीन-सर्टिफाइड परिसंपत्तियों में निवेश बढ़ा रहे हैं। वहीं, कंपनियाँ पूंजी के बेहतर उपयोग के लिए लीज़-फर्स्ट रणनीति अपना रही हैं। रेडी-बिल्ट और बिल्ट-टू-सूट सुविधाएँ तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं, जिनमें 2019 से सितंबर 2025 के बीच पुणे, चेन्नई और एनसीआर की संयुक्त हिस्सेदारी 76 प्रतिशत से अधिक रही है।

कुल मिलाकर, विनिर्माण-आधारित मांग आने वाले वर्षों में भारत के औद्योगिक और लॉजिस्टिक्स रियल एस्टेट इकोसिस्टम की प्रमुख विकास चालक बनी रहेगी।


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