Manoj Thakur

लकड़ी की सीजनिंग क्यों करनी चाहिए

सीजनिंग करने के बाद जब लकड़ी को टर्माइट ट्रीटमेंट (कीट मुक्त करने का उपचार) किया जाता है, उत्पाद की उम्र बढ़ जाती है। सीजनिंग की हुई लकड़ी पर जो भी काम किया जाता है, उसकी चमक और कारीगरी उम्दा होती है। इस वजह से लकड़ी का उत्पाद काफी आकर्षक और टिकाऊ बन जाता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में लकड़ी की गुणवत्ता को लेकर सीजनिंग के अंतरराष्ट्रीय मानक भी है। हमें स्थानीय बाजार के लिए भी निश्चित रूप से लकड़ी को चाहे वह वनों की हैं या कृशि वाणिकी की, सीजनिंग के बाद ही प्रयोग करना चाहिए। ताकि आयातित फर्नीचर का मुकाबला किया जा सके। और विदेशी मुद्रा की भी बचत की जा सके।

Seasoning: Promotion of Agro Forestry along with durable and strong woodहर तरह की लकड़ी की सीजनिंग करनी चाहिए

पेड़ चूंकि प्राकृतिक रूप से पैदा होते है, जिसमें जल ही उनका भोजन होता है। अतः उनमें नमी का पाया जाना स्वाभाविक है। प्रत्येक लकड़ी के अंदर प्राकृतिक रूप से कीड़ा होता है, जो नमी में मरता नहीं है। किसी लकड़ी में जल्दी तो किसी में देर से यह पुनर्जीवित हो जाते है। निश्चीत तापमान में सीजनिंग करने से यह मर जाते हैं और कीड़ा लगने की संभावना प्रायः समाप्त हो जाती है। आम तौर पर भारतीय परिवेश खासतौर पर उत्तर भारत में ज्यादातर आम, सफेदा, और अकाशीया लकड़ी फर्नीचर प्रयोग में लायी जाती है। इन सभी किस्मों की लकड़ी को प्रयोग में लाने से पहले सीजनिंग करना जरूरी है। सीजनिंग करके रबर से भी बेहद अच्छी गुणवत्ता का फर्नीचर दक्षिण भारत में बनता है।

सामान्य तौर पर सीजनिंग को क्यों नहीं अपनाया जा रहा है?

भारत में धूप का समय लंबा होता है। यह आम धारणा है कि कुछ महीनों तक धूप में रख देने पर लकड़ी की एयर सीजनिंग हो जाती है। ऐसा पूरी तौर पर होता नहीं है, क्योंकि इसमें बाहर की परत से तो नमी कम हो जाती है लेकिन अंदर की नहीं। सीजनिंग एक पूर्ण वैज्ञानिक प्रक्रिया है। नियंत्रित वातावरण में सीजनिंग चेम्बर में लकड़ी को निश्चित समय के लिए सीजन किया जाता है। समस्या यह है कि इस बारे में लोगों में जागरूकता का अभाव है। इस वजह से सामान्यतः इसे लेकर अभी इतनी गंभीरता नहीं है।

किसी लकड़ी विशेष में यह तो हो सकता है कि उसमें कीड़ा थोड़ी देरी से लगे। लेकिन लगेगा जरूर। कुछ विशेश प्रजातियों में, जैसे सागवान के लिए विशेष सावधानी बरतनी पड़ती है। क्योंकि इसे बहुत धीमी गति से सीजन करना पड़ता है। अन्यथा इसमें फटने की शिकायत आ जाती है।

सीजनिंग के बारे में व्यापक जागरूकता क्यों नहीं है

फर्नीचर और हथकरघा उद्योग के लिए लकड़ी की सीजनिंग बेहद जरूरी है। और प्रायः सभी उत्पादक सीजन करके ही लकड़ी का उपयोग करते है। कइयों के पास अपने प्लांट नहीं होने पर जोब वर्क पर करवा लेते है। इस पर खर्च भी ज्यादा नहीं है। सीजनिंग पर औसतन 65 रुपए प्रति क्यूबिक फीट (बजिद्ध खर्च आता है। जो कि बहुत कम है, इस बारे में व्यापक स्तर पर जागरूकता लाने की आवश्यकता है। सरकार और वन विभाग को चाहिए कि इस बारे में कोई निश्चित मानक तय करे। जिससे सीजनिंग लकड़ी ही प्रयोग में लायी जाए।

उत्पादक क्यों इस ओर ध्यान नहीं देते?

सीजनिंग करने से निर्विवाद रूप से उत्पादन लागत तो बढ़ ही जाती है। लकड़ी को सीजनिंग करने के बाद उत्पादक की सोच होती है कि वह हर जगह अब उच्च गुणवत्ता रखे। और फिर उत्पाद में उच्च कारीगरी का प्रयोग होगा। पॉलिश अच्छी की जाएगी। छोटी से छोटी चीज का भी अतिरिक्त ध्यान रखा जाएगा। जिससे उत्पाद उम्दा क्वालिटी का बने। इस सब से होता यह है कि सहज ही लागत बढ़ जाती है। बाजार में सस्ते फर्नीचर की मांग अधिक होने की वजह से फर्नीचर उत्पादक लागत में तदुपरांत गुणवता में कटौती करते चले जाते हैं।

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फिर तो सस्ते के चक्कर में गुणवत्ता से समझौता किया जा रहा है?

उपभोक्ता भी लकड़ी की गुणवत्ता को लेकर जागरूक नहीं है। यदि फर्नीचर खराब हो भी जाता है तो उपभोक्ता शिकायत ही नहीं करते हैं। समाज और बाजार में यह सामान्य सोच बनती जा रही है। इसके अलावा उपभोक्ताओं को भी सीजनिंग और बिना सीजनिंग लकड़ी के उत्पाद में फर्क की जानकारी ही नहीं है। इसलिए वह यह मान लेते हैं कि फर्नीचर चलता ही इतना है। उपभोक्ता इस बारे में जागरूक हो, इसके लिए अभियान चलाया जाना चाहिए।

सीजनिंग की सुविधा क्या इतनी है कि हर कोई इसका लाभ उठा सके

जिन शहरों में इस तरह के प्लांट नहीं है, वहां प्लांट लगाए जाने चाहिए। इसके लिए प्रारंभिक ढांचागत सुविधा यदि सरकार उपलब्ध करा दे तभी बात बन सकती है। और सीजनिंग को प्रोत्साहन मिलेगा। सहारनपुर की तरह सीजनिंग के यदि सरकारी प्लांट भी सभी शहरों में उपलब्ध हो तो भी यह सुविधा मिल सकती है।

क्या सीजनिंग से सिर्फ उपभोक्ताओं को ही लाभ है, उत्पादक को नहीं?

सीजनिंग से उत्पादक को भी उतना ही लाभ होता है क्योंकि इसके साथ ही उपभोक्ता के साथ उसका रिश्ता भी मजबूत होता है। बाजार में विश्वसनीयता बनती है। उत्पाद की गुणवत्ता अंतरराष्ट्रीय स्तर की बन जाती है। लेकिन अच्छे माल की मांग करने वाले ग्राहक को खोजना भी उतना ही दुशकर है।

एक बार बाजार में क्वालिटी की परख हो जाती है, उसके बाद तो ग्राहक अपने आप माल की मांग करता चला जाता है। शुरूआती दौर का संधर्श करने वाला उत्पादक अंततः विजयी होता है।

क्या सभी लकड़ी की सीजनिंग होनी चाहिए

यह धारणा बनती चली जा रही है कि लकड़ी का यह स्वभाव है। और इसे न तो बदला जा सकता है और न इसे सही किया जा सकता है। उपभोक्ता की यह सोच लकड़ी, पौधा रोपण, पर्यावरण किसी के लिए भी सही नहीं है। इस आधारभूत जानकारी और सीजनिंग की सुविधा के अभाव में उपभोक्ता लकड़ी की जगह स्टील व फाइबर जैसे उत्पाद प्रयोग करने लगते हैं।

सीजनिंग की लोकप्रियता से क्या लकड़ी की पैदावार बढ़ सकती है

लकड़ी का उपयोग बढ़ेगा तो लोग पौधा रोपण की ओर अतिरिक्त ध्यान देंगे। खासतौर पर कृषि वानिकी के क्षेत्र में। क्योंकि अभी कृषि वानिकी का ज्यादा इस्तेमाल प्लाईवुड या एम डी एफ आदि में हो रहा है। यदि सीजनिंग के प्रति जागरूकता बढ़ जाती है तो सफेदा और इस किस्म की आम पायी जाने वाली किफायती लकड़ी चौखट दरवाजे में भी इस्तेमाल हो सकती है। जिससे किसानों को लकड़ी के और बेहतर दाम मिलने की संभावना बनती है। लकड़ी का व्यापक स्तर पर इस्तेमाल होने के नए नए विकल्प खुलेंगे। जो किसानों के लिए एक मौके की तरह साबित हो सकते हैं। इससे निश्चित ही किसान कृषि वानिकी के प्रति और ज्यादा उत्साहित होंगे।

यह व्यवस्था भी होनी चाहिए कि यदि एक पेड़ कटता है तो उसकी जगह ज्यादा से ज्यादा पौधे लगा कर उन्हें विकसित किया जाए। जिससे भविष्य मे लकड़ी की जरूरत भी पूरी हो, और इसके साथ साथ प्रदूषण मुक्त वातावरण के लिए एक संतुलित क्रमागत जंजीर भी बने।

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