आयकर व्यवस्था की चिंताओं में प्रमुख है उसके दायरे का विस्तार में करना यानी अधिक से अधिक संख्या करदाताओं को इस व्यवस्था के अंतर्गत लाना। बड़े आधार यानी करदाताओं की अधिक संख्या वाली कर व्यवस्था ज्यादा स्थिर मानी जाती है और राजस्व का अधिक सशक्त स्रोत भी होती है।

आयकर रिटर्न के आंकड़े बताते हैं कि किसी वित्त वर्ष में कितने व्यक्तियों या पैन धारकों ने रिटर्न दाखिल किए। साथ ही आंकड़ों में यह भी बताया जाता है कि चुकाई गई कर राशि समेत विभिन्न पैमानों पर करदाता किस तरह बंटे थे।

आंकड़ों की इन अलग-अलग में श्रृंखलाओं को देखकर आयकर प्रणाली और करदाताओं के बीच के रिश्ते को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है।

  1. पहली श्रेणी: इसमें वे व्यक्ति हैं, जो कर चुकाते हैं और रिटर्न भी दाखिल करते हैं।
  2. दूसरी श्रेणी: इसमें वे आते जो कर तो चुकाते हैं मगर रिटर्न दाखिल नहीं करते।
  3. तीसरी श्रेणी: उन व्यक्तियों की है, जो शून्य रिटर्न दाखिल करते हैं यानी एक पैसे का भी कर नहीं चुकाते हैं।

भारतीय आयकर व्यवस्था में स्रोत पर कर कटौती यानी टीडीएस और स्रोत पर कर संग्रह यानी टीसीएस की व्यापक व्यवस्था है। ये व्यवस्थाएं इसलिए की गई ताकि कर संग्रह बढ़ सके और रिटर्न दाखिल करते समय अनुपालन हो सके। राजस्व संग्रह पर इनका खासा असर भी पड़ा है। इकट्ठा हुए कुल राजस्व में टीडीएस की हिस्सेदारी 2013-14 में 32 फीसदी थी, जो 2022-23 में बढ़कर 41 फीसदी हो गई।

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फर्मों के मामले में शून्य रिटर्न कुल दाखिल किए गए रिटर्न के केवल 28 फीसदी यानी बहुत छोटा हिस्सा रहे हैं। इसके उलट व्यक्तियों और कंपनियों के मामले में शून्य रिटर्न की हिस्सेदारी काफी अधिक है।

व्यक्तिगत श्रेणी में रुझान काफी नाटकीय हैं। औसतन 2 करोड़ के करीब करदाता आयकर तो चुकाते हैं मगर रिटर्न नहीं भरते। पिछले कुछ वर्षों में यह आंकड़ा बदला नहीं है। अनुपालन की जरूरत में आए बदलाव भी कुछ हद तक इसकी वजह हो सकते हैं, जिनके तहत नियम है कि ऊंची रकम वाले कुछ लेनदेन करने पर रिटर्न दाखिल करना अनिवार्य होता है।

अनिवार्य अनुपालन के प्रावधान से भी कर भुगतान में इजाफा होता नहीं दिख रहा है।

कंपनियों के मामले में नोटबंदी यानी विमुद्रीकरण और माल एवं सेवा कर (जीएसटी) के कारण ऐसे रिटर्न बढ़ते दिख रहे हैं, जिनमें कर भी चुकाया गया है और शून्य रिटर्न की संख्या में कमी आई।


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