पिछले कुछ हफ्तों से निजी उपभोग में कमी सुर्खियों में बनी हुई है। निजी उपभोग में यह कमी एक साथ कई कारणों से आई।

पहला कारण तो अस्थायी कर्मियां के वेतन और खुद के रोजगार में लगे लोगों की कमाई की सुस्त रफ्तार है। दूसरा कारण खाद्य मुद्रास्फीति है, जो पिछले 8 तिमाहियों में औसत 7.1 प्रतिशत रही। निम्न आय वर्ग वाले परिवारों को अन्य आय वर्ग वालों की तुलना में मासिक आय का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च करना पड़ा। इस तरह बढ़ी हुई खाद्य महंगाई ने कम आय वाले परिवारों की गैर-जरूरी सामान पर खर्च की क्षमता बहुत कम कर दी है।

तीसरा कारण वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) रहा। अप्रत्यक्ष करों का बोझ बढ़ने से खुदरा कीमतें बढ़ गईं, जिनका नतीजा कमजोर मांग के रूप में सामने आया।

चौथा कारण परिवारों पर वित्तीय देनदारी थीं। उपलब्ध आंकडे़ यह संकेत दे रहे हैं कि परिवारों का घरेलू ऋण 2023-24 में संभवतः और बढ़ गया होगा। कर्ज चुकाने का बोझ बढ़ने की एक वजह ब्याज दरों में बढ़ोतरी भी थी। मुद्रास्फीति पर काबू पाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने नीतिगत दर बढ़ाई थी, जो जरूरी भी था। इस तरह कर्ज चुकाने का बोझ बढ़ने और खपत के लिए पर्सनल लोन लेने की रफ्तार घटने से उपभोग को बहुत झटका लगा है।

पांचवा कारण देश का शेयर बाजार रहा, जिसने पिछले कुछ वर्षा में दूसरे शेयर बाजारों की तुलना में शानदार प्रदर्शन किया है। अप्रैल 2022 से मार्च 2024 के बीच देसी निवेशकों को मोटा मुनाफा हुआ। इससे खपत भी बढ़नी चाहिए थी। मगर खुदरा निवेशकों को 2022 और 2024 के बीच डेरिवेटिव्स श्रेणी में 1.81 लाख करोड़ रूपये का नुकसान भी हुआ। गौर करने वाली बात यह है कि इसमें से ज्यादातर नुकसान (90 प्रतिशत) उन निवेशकों को हुआ जिनकी सालाना आय 5 लाख रूपये से कम थी। नकद श्रेणी में मुनाफा सांकेतिक होता है क्योंकि जब तक शेयर बेचे नहीं जाते नकदी हाथ में नहीं आती। इसके विपरित डेरिवेटिव्स में नुकसान वास्तविक होता है। इसने भी मध्यम आय वर्ग के लोगों के उपभोग पर असर डाला होगा।

ये सभी कारक मध्य वर्ग के लिए नुकसानदेह रहें हैं और उसका उपभोग इनकी वजह से कम हुआ है। चूंकि उच्च-आय वर्ग के लोगों पर इन चुनौतियों का ज्यादा असर नहीं पड़ा, इसलिए उनका खर्च कम नहीं हुआ। विभिन्न क्षेत्रों में प्रीमियम उत्पाद तेजी से बढ़ना इसी बात को साबित करता है।

भारत में कुल मांग में निजी उपभोग की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है और इसमें सुस्ती देश की अर्थव्यवस्था की वृद्धि के लिहाज से ठीक नहीं है।

बड़ा सवाल यह है कि निजी खपत में आई कमी कुछ समय के लिए है या व्यवस्था में किसी गहरी समस्या की ओर इशारा कर रही है।