सरकार ‘‘उर्वरक कंपनियों को वित्तीय राहत‘‘ देने पर विचार कर रही है, क्योंकि उर्वरकों के लिए महत्वपूर्ण कच्चे माल पर ‘‘जीएसटी दरों में कमी‘‘ के बावजूद, सब्सिडी से संबंधित ‘‘मूल्य उलट (प्राइस इन्वर्शन)‘‘ की समस्या का समाधान नहीं हुआ है, जिसने उद्योग के लिए ‘‘इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) का संचय‘‘ कर दिया है।

राहत ‘‘लाभांश या बॉन्ड‘‘ के रूप में दी जा सकती है।

भारत में अधिकांश वस्तुओं के विपरीत, उर्वरक ‘‘मुक्त बाजार मूल्य पर नहीं बेचे जाते।‘‘ किसानों की वहनीयता सुनिश्चित करने के लिए इन्हें लागत से कम मूल्य पर बेचा जाता है, और सरकार बिक्री के बाद कंपनियों को ‘‘सब्सिडी‘‘ देती है। यह सब्सिडी ‘‘जीएसटी से मुक्त‘‘ है, इसलिए कंपनियों को इसका रिफंड नहीं मिलता।

हालांकि, किसान जो भुगतान करते हैं वह उत्पाद की लागत से कम होता है क्योंकि वे आमतौर पर ‘‘उस सब्सिडी को घटा देते हैं‘‘, जो बिक्री के बाद कंपनी को मिलेगी। लेकिन सरकार कंपनियों को ‘‘जीएसटी रिफंड या आईटीसी उस मूल्य पर देती है जो किसान भुगतान करते हैं‘‘, न कि वास्तविक लागत पर, जिस पर कंपनियों ने पहले ही जीएसटी चुका दिया है।

FICCI ने वित्त मंत्री ‘‘निर्मला सीतारमण‘‘ को टैक्स सुधारों की घोषणा से पहले पत्र में बताया कि इस लगातार बने दोषपूर्ण कर प्रणाली के कारण ‘‘केवल कुछ बड़ी उर्वरक कंपनियों के लिए लगभग आरएस 3,500 करोड़ रूपये कार्यशील पूंजी में फंस गई‘‘ है।

पत्र में कहा गयाः ‘‘यह असमानता उपयोग में न आई आईटीसी के लगातार संचय का कारण बनी है, जिससे महत्वपूर्ण कार्यशील पूंजी अवरुद्ध हो रही है,‘‘ जो फॉस्फेटिक, पोटाशिक और एनपीके उर्वरकों के ‘‘निर्माताओं और आयातकों पर दबाव‘‘ डाल रही है।


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