पिछले कई दशकों से लगातार सरकारों के प्रयासों और योजनाओं के बावजूद भारत के वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने में नाकामी के कई कारण बताए गए हैं। इसमें उच्च लाजिस्टिक्स और बिजली लागत, कम श्रम उत्पादकता और स्थानीय नियमों के मुद्दों जैसी समस्याओं के बारे में अक्सर बात होती रही है। लेकिन भारतीय उत्पादों के खराब गुणवत्ता मानकों पर आम तौर पर ध्यान नहीं दिया जाता है।

एक के बाद एक आने वाली केंद्र सरकार, राज्य सरकार और सेक्टर नियामकों ने अक्सर भारत में निर्मित और बेची जाने वाली वस्तुओं की गुणवत्ता की ओर ध्यान नहीं दिया है। साथ ही लैटिन अमेरिका, अफ्रीका या एशिया जैसे कम विकसित देशों में निर्यात की जाने वाली वस्तुओं की गुणवत्ता के बारे में भी ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता है।

ऐसा नहीं है कि भारतीय निर्माता उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद नहीं बना सकते। अमेरिका, यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया आदि को निर्यात करने वाली किसी भी क्षेत्र की कोई भी भारतीय विनिर्माण इकाई इन बाजारों के उच्च गुणवत्ता मानकों को पूरा करती है। वे जो सामान निर्यात करते हैं, वह उसी निर्माता द्वारा घरेलू बाजार में बेचे जाने वाले सामान की तुलना में गुणवत्ता में काफी अधिक बेहतर होता है।

ऐसा भी नहीं है कि भारतीय नियम नियमित रूप से ढीले हैं। भारतीय गुणवत्ता मानक आम तौर पर अंतरराष्ट्रीय स्तर के है। हालांकि कुछ भारतीय मानदंड - दवाओं या खाद्य पदार्थों में - विकसित देशों की तरह इतने कड़े नहीं है।

यह सुनिश्चित करना होगा कि कंपनियां सिर्फ सर्टिफिकेशन के वक्त ही गुणवत्ता पर ध्यान देती है, या फिर वास्तव में वह अपने उत्पाद में उच्च गुणवत्ता को तवज्जो देते हैं।

इसी तरह, ऐसा नहीं होना चाहिए कि, केवल निर्यात किए जाने वाले मसालों में कीटनाशकों की मात्रा व अन्य दूषित पदार्थों के लिए कड़े परीक्षण प्रक्रिया को अपनाने चाहिए, जबकि घरेलु ग्राहकों को घटिया और मिलावटी सामान के उपयोग के लिए बाध्य होना पड़े।

यह तर्क सही नहीं है कि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के पास पूंजी और संसाधनों की कमी है। इसलिए वह उच्च गुणवत्ता युक्त उत्पादन तैयार नहीं कर पाते। यह सिर्फ एक बहाना है, क्योंकि इसके पीछे नीति-निर्माताओं और जांच करने वाली एजेंसियों की लापरवाही बड़ा कारण है। पर्याप्त प्रयोगशाला परीक्षण सुविधाएं स्थापित करना, पर्याप्त योग्य निरीक्षकों को नियुक्त करना और छोटे उद्यमों को गुणवत्ता में बेहतर बनने में मदद करना सरकार और नियामकों का काम है।

यह तर्क भी पूर्ण नहीं है कि गुणवत्ता मानकों को पूरा करने से लागत में वृद्धि होगी। गुणवत्ता मानकों से समझौता किए बिना, लॉजिस्टिक्स में सुधार, बिजली की लागत और सरकारी करों को कम करके लागत को कम किये जा सकते हैं। सरकार द्वारा लगाए गए करों के कारण अधिकांश कारों की कीमत विकसित बाजारों की तुलना में भारत में अधिक है। घरेलू उपभोक्ता विदेशी बाजार की तुलना में गुणवत्ता के मामले में कमतर हो जाते हैं, भले ही एक ही विनिर्माण सुविधा द्वारा दोनों बन रहीं हो।

प्रत्येक देश जो एक विनिर्माण शक्ति बना हैं, उसने अपने द्वारा बनाए गए उत्पादों की गुणवत्ता को बढ़ाकर और यह सुनिश्चित करके कि घरेलू ग्राहकों को गुणवत्ता के मामले में कोई कमी न हो, ऐसा किया हैं। भारतीय नीति निर्माताओं को यह समझने की जरूरत है।

साथ ही, निगमित क्षेत्र को भी यह समझने की जरूरत है कि गुणवत्ता मानसिकता को अपनाए बिना, वे कभी भी विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी नहीं बन सकते।

P. Dutta


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