साइबर फ्रॉड में जनता को प्रशासन से डर क्यों?
- दिसम्बर 9, 2024
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हाल के दिनों में साइबर अपराधियों ने कई लोगों को निशाना बनाया है और उन्हें ‘डिजिटल अरेस्ट’ कर धमकी दी है। वे साइबर ठगी करते समय पुलिस अधिकारी, प्रतिभूति बाजार नियामक या नारकोटिक्स आदि विभागों के सरकारी अधिकारी होने का दिखावा करते हैं। जिन लोगों को निशाना बनाया जाता है उनके बैंक खातों को खाली कर दिया जाता है और कुछ मामलों में उनके पैसे क्रिप्टोकरेंसी वॉलेट में स्थानांतरित कर दिए जाते हैं।
जो लोग अपेक्षाकृत डिजिटली साक्षर हैं, वे भी इन अपराधियों के शिकार हो गए, यह एक विडंबना है।
बैंकिंग नियामक आदि अपने स्तर पर ऐसे अपराध करने वाले अपराधियों को पकड़ पाने की क्षमता नहीं रखते। इनमें से कई तो भारत की सीमाओं से बाहर रहते हैं। दक्षिण पूर्वी एशिया के देश इनके खास अड्डे हैं। ऐसे अपराध रोकने और अपराधियों को उनके अंजाम तक पहुंचाने की बुनियादी जिम्मेदारी सरकार की है और वह इस दायित्व से बच नहीं सकती।
इसका एक और उदाहरण है हाल ही में बम धमाकों की धमकी। दीवाली के पहले व्यस्त सीजन में इन धमकियों ने देश के विमानन क्षेत्र को बुरी तरह प्रभावित किया। महज चंद दिनों में विभिन्न उड़ानों के बारे में ऐसी 100 से अधिक धमकियां दी गईं। इससे हवाई अड्डों की सुरक्षा के जिम्मेदारों पर दबाव बढ़ा और कई हवाई अड्डों पर अफरातफरी की स्थिति बन गई।
परंतु अधिकारियों की शुरुआती प्रतिक्रिया सोशल मीडिया वेबसाइटों को दोष देने की रही जहां ऐसी धमकियां सामने आ रही थीं। इन वेबसाइटों का जांचकर्ताओं के साथ सहयोग करने में नाकाम रहना और पुलिस की मांग पर इन पोस्ट से संबंधित आईपी एड्रेस मुहैया नहीं करा पाना तथा धमकियों को गंभीरता के आधार पर चिह्नित नहीं कर पाना एक अलग अक्षभ्य मसला है। लेकिन उनसे यह आशा करना गलत है कि वे पुलिस का कर्तव्य निभाएं।
वित्तीय नियामकों तथा नागर विमानन के प्रभारियों तथा कुछ मामलों में स्थानीय पुलिस सहित अधिकारियों के लिए डिजिटल अपराध एक नया मोर्चा है। यह स्वाभाविक है कि उनके पास शायद इस काम के लिए जरूरी विशेषज्ञता और अनुभव नहीं हो।
परंतु ऐसी क्षमता विकसित की जानी चाहिए। अगर साइबर ठगी करने वाले और डिजिटल अफवाह फैलाने वालों की क्षमता बढ़ रही है तो प्राधिकारियों को भी अपनी क्षमता उसी अनुपात में बढ़ानी चाहिए।
जहां तक ‘डिजिटल अरेस्ट’ के डर की बात है तो प्रशासन पर अविश्वास विशेष तौर पर उल्लेखनीय है कि सरकार को खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि ऐसी धमकियों पर इतनी आसानी से विश्वास कैसे कर लिया जा रहा है।
पुलिस और पुरातन कानूनों का डर इतना व्यापक क्यों है कि ठगी करने वाले आसानी से इसका लाभ लेकर मासूमों को भयभीत कर देते हैं?




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