‘विकसित भारत’ के लिए भविष्य के लिए तैयार कार्यबल (Future Ready Workforce) तैयार करने की दिशा में 11 प्रमुख खामियों (formidable gaps) की पहचान केंद्र सरकार ने की है। यह जानकारी केंद्र ने सभी मुख्य सचिवों को भेजे एक नोट में साझा की है।

इन चुनौतियों में महिलाओं की उन्नत भूमिकाओं और टेक्नोलॉजी/मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्रों में कम भागीदारी, डिजिटल असमानता, निजी क्षेत्र की सीमित भागीदारी, 20 मंत्रालयों द्वारा अलग-अलग कौशल योजनाएँ चलाना, प्रशिक्षकों की कमी और प्रशिक्षण ढांचे की कमजोरियाँ शामिल हैं।

मुख्य सचिवों के 5वें राष्ट्रीय सम्मेलन से पहले जारी इस नोट में केंद्र ने कई सरकारी प्रयासों का उल्लेख किया है, लेकिन यह भी स्वीकार किया गया है कि -“स्पष्ट प्रगति के बावजूद, गंभीर खामियाँ अब भी बनी हुई हैं।”

यह नोट कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय (MSDE) और कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) द्वारा संयुक्त रूप से तैयार किया गया है।

प्रमुख चुनौतियाँ जो केंद्र ने चिन्हित कीं

1. औपचारिक कौशल प्रशिक्षण का सीमित दायराः भारत की 15-29 आयु वर्ग की केवल 4.42 प्रतिशत जनसंख्या के पास मान्यता प्राप्त व्यावसायिक प्रमाणपत्र है, जबकि दक्षिण कोरिया (96 प्रतिशत), जापान (80 प्रतिशत) और जर्मनी (75 प्रतिशत) में यह अनुपात कहीं अधिक है।

MSDE का मानना है कि “पूर्व अधिगम की मान्यता (RPL)” और व्यावसायिक शिक्षा को मुख्यधारा के पाठ्यक्रमों में एकीकृत करना अत्यावश्यक है, परंतु वर्तमान कवरेज आवश्यक पैमाने के अनुरूप नहीं है।

2. गतिशील मांग योजना और श्रम बाजार सूचना की कमीः कौशल पारिस्थितिकी तंत्र ऑटोमेशन, एआई और नई तकनीकों से प्रेरित तेजी से बदलते श्रम बाजार रुझानों के अनुरूप नहीं है।

वर्तमान में केवल 41 प्रतिशत आईटीआई और 29 प्रतिशत पॉलीटेक्निक स्नातक रोजगार योग्य माने जाते हैं।

3. एकीकृत श्रम बाजार सूचना प्रणाली (LMIS) का अभावः जैसे एयरोस्पेस सेक्टर में शैक्षणिक परिणाम उद्योग की वास्तविक मांगों से मेल नहीं खाते।

इसलिए GST, और Invest India जैसे उच्च-आवृत्ति डेटासेट को एकीकृत करने वाली LMIS प्रणाली की आवश्यकता है ताकि साक्ष्य-आधारित योजना बनाई जा सके।

 

4. उद्योग की सीमित भागीदारीः उद्योग और सरकार के बीच कई एमओयू होने के बावजूद, उद्योग की भागीदारी पाठ्यक्रम डिज़ाइन, प्रशिक्षण और भर्ती में बहुत सीमित है। इसी तरह, अप्रेंटिसशिप प्रोग्राम अभी भी “आवश्यक पैमाने” तक नहीं पहुँचे हैं।

5. शिक्षा और कौशल विकास के बीच सीमित एकीकरणः MSDE ने सुझाव दिया है कि सामान्य शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण के बीच लचीले और परिभाषित मार्ग (pathways) बनाए जाएँ, जिससे कैरियर गतिशीलता बढ़े और व्यावसायिक शिक्षा को आकर्षक बनाया जा सके।

6. खंडित शासन और संस्थागत समन्वय की कमीः केंद्र सरकार के 20 से अधिक मंत्रालय कौशल योजनाएँ चला रहे हैं, जिससे प्रणाली अत्यधिक विखंडित हो गई है। राज्य और केंद्र स्तर के बीच समन्वय कमजोर है और डेटा प्रवाह सीमित है।

केंद्र ने कहा है कि Whole of Government मॉडल अभी शुरुआती चरणों में है।”

7. प्रशिक्षक की कमी और क्षमता अंतरालः प्रशिक्षकों की गुणवत्ता और उपलब्धता “मुख्य बाधा” है। अधिकांश प्रशिक्षकों के पास न तो उद्योग का अनुभव है और न ही आधुनिक शिक्षण तकनीकों का ज्ञान। प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन (incentives) और मानकीकृत प्रशिक्षक ढाँचे की भी कमी है।

8. हाशिए पर रहने वाले समुदायों के लिए कौशल तक पहुंच की कमीः कमजोर बुनियादी ढांचे, खराब कनेक्टिविटी और सामाजिक अलगाव के कारण वंचित वर्गों की कौशल कार्यक्रमों तक पहुँच सीमित है।

9. लैंगिक बाधाएँ और महिलाओं की कम भागीदारीः सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताएँ, आवागमन प्रतिबंध, सुरक्षित बुनियादी ढांचे की कमी, सीमित चाइल्ड केयर सुविधाएँ, बिना वेतन के कार्य और डिजिटल असमानता के कारण महिलाओं के लिए रोजगार विकल्प सीमित हैं।

हालाँकि, सरकार ने कुछ लैंगिक-केन्द्रित पहलें शुरू की हैं, परंतु वे अभी वांछित स्तर तक प्रभावी नहीं हो पाई हैं।

10. वैश्विक गतिशीलता के साथ सामंजस्य की कमीः अंतरराष्ट्रीय स्तर पर योग्यता की मान्यता का अभाव और सीमित भाषा प्रशिक्षण के कारण वैश्विक नियुक्तियाँ कम हैं। डैक्म् का कहना है कि Skill India International Centres (SIICs) विकसित किए जा रहे हैं, लेकिन विदेश मंत्रालय और सरकार-से-सरकार सहयोग (G2G) को और बढ़ाने की जरूरत है।

11. कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों में कौशल की आवश्यकताः भारत की 43 प्रतिशत कार्यबल कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में कार्यरत है, लेकिन उनका योगदान जीडीपी में केवल 18 प्रतिशत है।

इनमें से केवल 10 प्रतिशत कार्यबल को ही औपचारिक प्रशिक्षण मिला है।

ग्रामीण कौशल केंद्रों का बुनियादी ढांचा अपर्याप्त है और प्रशिक्षण पाठ्यक्रम आधुनिक तकनीकों के अनुरूप नहीं हैं।

(Courtesy: The ET)

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