पिछले चार वर्षों में सराहनीय तीन गुना वृद्धि के बावजूद, निर्यात करने वाले एमएसएमई की संख्या पिछले साल तक महज 1,73,350 थी। हालांकि 7.3 करोड़ एमएसएमई के मजबूत आधार के मुकाबले देखने पर, यह आंकड़ा मात्र 0.23 फीसदी का प्रतिनिधित्व करता है।

भारत में एमएसएमई का अधिकांश हिस्सा सूक्ष्म उद्यमों का है और इनमें से कई अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। उनके कारोबार का दायरा भी बड़ा नहीं है और न ही जरूरी तकनीक उनके पास है। इसके अलावा उनकी संरचना भी ऐसी नहीं है कि वे अहम क्षेत्रों में वैश्विक वैल्यू श्रृंखला (जीवीसी) की मांग को पूरा कर सकें जिनमें जटिल अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन का पालन करना शामिल है।

इसके अलावा आधुनिक इन्वेंट्री प्रबंधन मॉडल जैसे कि श्जस्ट इन टाइम (जेआईटी) और लीन मैन्युफैक्चरिंगश् को लागू करने की क्षमता भी होनी चाहिए जिसके लिए डिजिटल तकनीक और भरोसेमंद लॉजिस्टिक्स की जरूरत होती है। साथ ही इंडस्ट्री 4.0 टूल के साथ जुड़ना भी अहम है।

भारत के लिए बड़ा अवसर तभी बन पाएगा जब एक व्यापक, निष्क्रिय आधार को एक औपचारिक, जीवीसी के लिए तैयार आपूर्तिकर्ता पूल में बदला जा सके। इस अवसर का फायदा उठाने के लिए, सामान्य कल्याणकारी उपायों से हटकर लक्षित, क्रियान्वयन पर केंद्रित हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

साथ ही साथ, कुशल कर्मचारियों के बिना कोई भी तकनीक बेकार है। भारत को जल्द से जल्द ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों की शुरुआत करनी होगी जिनमें जीवीसी से जुड़े जरूरी कौशल की जानकारी दी जाए, जैसे कि गुणवत्ता की जांच करना, डिजिटल परिचालन, मशीनों का रख-रखाव और आपूर्ति श्रृंखला का प्रबंधन

इसके साथ ही, विनिर्माण के क्षेत्र में साझा जांच केंद्र और प्रमाणपत्र देने वाले केंद्र भी खोलने होंगे। इन केंद्रों से छोटे कारोबारों को नियमों का पालन करने का खर्च कम करने में मदद मिलेगी और खरीदारों का भरोसा बढ़ेगा।

भारत को अपने 99.76 फीसदी एमएसएमई को सशक्त बनाने के लिए जल्दी और सही कदम उठाने ही होंगें। दुनिया का विनिर्माण केंद्र बनने के लिए सिर्फ इरादा नहीं, बल्कि कड़ी मेहनत, ध्यान और बड़े पैमाने पर काम करना जरूरी है।

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