सिंगापुर और कोलंबो के ट्रांसशिपमेंट बंदरगाहों पर बढ़ती भीड़ का असर अब भारत पर भी पड़ रहा है। भारतीय निर्यातकों के अनुसार, पर्याप्त संख्या में फीडर जहाज उपलब्ध नहीं होने के कारण कंटेनरों की आवाजाही प्रभावित हो रही है। क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि चीन-अमेरिका व्यापार में आई तेजी के कारण भी बड़ी संख्या में कंटेनर इन दोनों प्रमुख व्यापारिक देशों के बीच लगाए जा रहे हैं, जिससे अन्य देशों के लिए कंटेनरों की उपलब्धता कम हो गई है।

इस स्थिति का असर वैश्विक स्तर पर फ्रेट दरों पर भी पड़ रहा है। समुद्री अनुसंधान एवं परामर्श कंपनी क्तमूतल के अनुसार, पिछले सप्ताह शंघाई से लॉस एंजिल्स के बीच 40-फुट कंटेनर की दर सालाना आधार पर 133 प्रतिशत बढ़कर 5,894 डॉलर हो गई। वहीं, शंघाई से न्यूयॉर्क के लिए कंटेनर दर 106 प्रतिशत बढ़कर 7,893 डॉलर पहुंच गई।

चीनी निर्यातक क्रिसमस सीजन की मांग से पहले अमेरिका को होने वाले अपने निर्यात को तेजी से भेज रहे हैं। इससे वैश्विक स्तर पर कंटेनरों की उपलब्धता पर दबाव बढ़ गया है और कंटेनर आपूर्ति में कमी जैसी स्थिति बन रही है।

घरेलू व्यापारियों के अनुसार, इस दौरान कंटेनर इम्बैलेंस फीस भी वसूली जा रही है। कुछ व्यापारियों का कहना है कि शिपिंग कंपनियां मनमाने ढंग से शुल्क बढ़ा रही हैं।

हालांकि, Container Shipping Lines Association ने कंटेनरों की कमी की बात से इनकार किया है। एसोसिएशन के अनुसार, सिंगापुर और कोलंबो जैसे ट्रांसशिपमेंट बंदरगाहों पर कुछ हद तक भीड़ जरूर है, जिसके कारण कंटेनरों की आवाजाही में देरी हो सकती है।

चेन्नई स्थित एक पैकेजिंग निर्माता ने बताया कि कोलंबो और सिंगापुर में भारी भीड़ के कारण कंटेनर वहां फंस रहे हैं। मलेशिया के पोर्ट क्लांग से चेन्नई के लिए पर्याप्त फीडर जहाज उपलब्ध नहीं होने के कारण कंटेनरों को सिंगापुर के रास्ते भेजा जा रहा है। इसके चलते कंटेनरों को सिंगापुर में 15 से 20 दिनों तक इंतजार करना पड़ रहा है।

इससे भारतीय निर्यातकों के लिए न केवल डिलीवरी समय बढ़ रहा है, बल्कि बढ़ती फ्रेट दरों और अतिरिक्त शुल्क के कारण लॉजिस्टिक्स लागत पर भी दबाव बढ़ रहा है।

 

GR. Team


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