जब किसी अर्थव्यवस्था को युद्ध या महामारी जैसा कोई झटका लगता है तो मोटे तौर पर यह दो तरीकों से संभल सकती है - या तो बढ़ी हुई कीमतों के जरिये या राज्य द्वारा लगाए गए प्रशासनिक नियंत्रणों से। बाजार अर्थव्यवस्थाएं मुख्य रूप से कीमतों पर निर्भर करती हैं। केंद्र से नियोजित व्यवस्थाएं अफसरशाही द्वारा आवंटन पर निर्भर करता है।

दुनिया भर के ऊर्जा बाजारों में इस समय मची उठापटक बता रही है कि यह अंतर मायने क्यों रखता है।

सबसे पहले, मूल्य दो अहम काम करते हैंरू वे जानकारी देते हैं और प्रोत्साहन का ढांचा भी तय करते हैं। कीमतें लाखों उपभोक्ताओं, कारोबारों, व्यापारियों और निवेशकों के फैसलों को एक संकेत में बदल देती हैं, जिससे पता चलता है कि चीजों की कमी है या अधिकता है।

जब ईंधन महंगा होता है तो लोग वाहन कम चलाने लगते हैं, बिना जरूरत सफर करना टाल देते हैं या सार्वजनिक परिवहन इस्तेमाल करने लगते हैं। कारोबार भी ऊर्जा का गैर-जरूरी खर्च बंद कर देते हैं या विकल्प तलाशते हैं।

उत्पादकों को इसके विपरीत संकेत मिलता हैरू कीमत ज्यादा होने पर वे आपूर्ति बढ़ाते हैं, माल को कमी वाली जगह ले जाते हैं या विकल्प तलाशते हैं।

कीमतें इस समस्या को बेहतर ढंग से हल करती हैं क्योंकि हालात बदलने पर लोग अपने तौर-तरीके खुद ही बदल लेते हैं। इससे आर्थिक स्वतंत्रता बनी रहती है और यह भी पक्का हो जाता है कि क्या खपाना है, क्या बचाना है या क्या जरूरी है, यह फैसला सीमित जानकारी वाले किसी सरकारी प्राधिकरण के बजाय वे लोग करें, जिन पर सीधा असर पड़ रहा है।

दूसरा, राज्य के दखल से अक्सर अनचाहे परिणाम सामने आते हैं। कृषि उत्पादों के निर्यात पर प्रतिबंध से फसल की कीमतें गिर सकती है। सोने के आयात पर रोक से इसकी कमी हो सकती है और कालाबाजारी तथा तस्करी शुरू हो सकती है।

कीमतों को जानबूझकर नीचे रखना शुरू में ठीक लग सकता है मगर उसका खमियाजा अंत में दूसरी जगह नजर आता है और अक्सर करदाताओं पर बोझ बढ़ जाता है।

अंत में राज्य के बार-बार हस्तक्षेप से अनिश्चितता बढ़ती है क्योंकि लोग बाजार के संकेतों पर प्रतिक्रिया करना बंद कर देते हैं और यह भांपने में जुट जाते हैं कि सरकार क्या कदम उठाएगी। कई कारोबार निवेश से जुड़े फैसले टाल देते हैं क्योंकि उन्हें पता ही नहीं होता कि कौन से नए नियंत्रण या प्रतिबंध लग सकते हैं। इससे व्यापक नीति व्यवस्था में भरोसा घटता है।

कीमतें समस्या नहीं हैं, बल्कि ये तो झटके सहने में अर्थव्यवस्था की मदद करती हैं। नीति निर्माताओं का काम इन संकेतों को दबाना नहीं है बल्कि कीमतों को अपना काम करते रहने देना और कमजोर लोगों को लक्षित तरीकों से बचाना है।