तजा समाचारों के अनुसार, यमन के ईरान समर्थित ’’हूती विद्रोहियों ने दक्षिणी लाल सागर में कुछ और रणनीतिक द्वीपों पर कब्जा कर लिया है।’’ फारस की खाड़ी के मुहाने पर स्थित ’’होर्मुज जलडमरूमध्य’’ की तरह, अरब प्रायद्वीप के दूसरी ओर स्थित ’’बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य’’ भी एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग (चोकपॉइंट) है। यह लाल सागर को खुले समुद्र से जोड़ता है और सऊदी अरब के प्रमुख एशियाई बाजारों तक पहुंच के लिए एक महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्ग है।

पाइपलाइन जो सऊदी अरब को ’’होर्मुज जलडमरूमध्य’’ से बचते हुए ’’बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य’’ के रास्ते अपने तेल निर्यात को फिर से भेजने’’ में मदद करती है, का बंद होना, वैश्विक तेल आपूर्ति को खतरे में डाल सकता है।

इसके परिणामस्वरूप कच्चे तेल के प्रमुख बेंचमार्क ’’ब्रेंट क्रूड’’ की कीमत बढ़कर लगभग ’’108 डॉलर प्रति बैरल’’ हो गई है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का ’’85% से अधिक आयात’’ करता है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है।

कच्चे तेल को पूरी अर्थव्यवस्था के लिए ’’“इनपुट कॉस्ट”’’ माना जाता है। इसका उपयोग केवल पेट्रोल, डीजल और एलपीजी तक सीमित नहीं है, बल्कि परिवहन, विनिर्माण, रसायन और विमानन सहित कई क्षेत्र सीधे तौर पर कच्चे तेल से जुड़े हैं।

चुनौतियां

’’व्यापार घाटा:’’ भारत को समान मात्रा में कच्चा तेल आयात करने के लिए भी अधिक डॉलर खर्च करने पड़ते हैं, जिससे आयात और निर्यात के बीच का अंतर यानी व्यापार घाटा बढ़ जाता है।

’’चालू खाता घाटा:’’ तेल आयात का बिल बढ़ने से चालू खाता घाटा बढ़ता है। अनुमानों के अनुसार, यदि कच्चे तेल की कीमत ’’100 डॉलर प्रति बैरल’’ पर बनी रहती है, तो चालू खाता घाटा बढ़कर ’’GDP के 1.9% से 2.2%’’ तक पहुंच सकता है।

’’राजकोषीय घाटा:’’ यदि बढ़ी हुई लागत का बोझ उपभोक्ताओं पर डाला जाता है, तो महंगाई बढ़ती है। वहीं, यदि सरकार उत्पाद शुल्क में कटौती या सब्सिडी के माध्यम से इस झटके को खुद वहन करती है, तो राजकोषीय घाटे पर दबाव बढ़ता है।

महंगाई पर असर डीजल की कीमतें बढ़ने से ’’माल ढुलाई और परिवहन लागत’’ बढ़ जाती है, जिससे खाद्य पदार्थों से लेकर दैनिक उपयोग की वस्तुओं तक सब कुछ महंगा हो सकता है। त्ठप् के अनुसार, कच्चे तेल की कीमत में ’’10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि’’ से महंगाई में लगभग ’’49 आधार अंक (0.49%)’’ की बढ़ोतरी हो सकती है।

’’रुपये पर दबाव:’’ तेल का आयात बिल बढ़ने से डॉलर की मांग बढ़ती है, जिससे रुपये में कमजोरी आ सकती है। कमजोर रुपया अन्य आयातों को भी महंगा कर देता है, जिससे महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है।

’’विदेशी निवेशकों की बिकवाली:’’ कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, अधिक महंगाई और कॉरपोरेट आय में संभावित गिरावट की आशंका के चलते ’’विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI)’’ भारतीय शेयर बाजार से अपनी पूंजी निकाल सकते हैं।

संकट कितना गंभीर है?

’’108 डॉलर प्रति बैरल’’ का स्तर अपने आप में किसी गंभीर व्यापक आर्थिक संकट का संकेत नहीं है। भारत के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार है और हाल के समय में चालू खाता घाटा भी नियंत्रण में रहा है।

हालांकि, यदि कच्चे तेल की कीमतें कई महीनों तक ’’100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर’’ बनी रहती हैं या पश्चिम एशिया में आपूर्ति श्रृंखला बाधित होती है, तो यह स्थिति ’’आर्थिक विकास और महंगाई के बीच संतुलन’’ को काफी हद तक बिगाड़ सकती है।


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