पिछले कुछ समय से भारत में शुल्क दरें बढ़ रही हैं। कई लोग मान रहे हैं कि शुल्क इजाफे ने देश की विनिर्माण कंपनियों को सुरक्षा दी है और वे अर्थव्यवस्था आकार में इजाफा कर सकती हैं।

परंतु आकड़े एकदम स्पष्ट हैः संरक्षणवादी रूख ने विनिर्माण की होड़ में खास फायदा नहीं पहुंचाया है। इक्का-दुक्का उदाहरण हो सकते है, लेकिन वैश्विक निर्यात में भारतीय उद्योग जगत की हिस्सेदारी ठहरी रही बल्कि गिर ही गई। आयात पर ऊंचे शुल्क ने भारतीय उद्योगों को वैश्विक मूल्य श्रृंखला जुड़ने में दिक्कत पैदा की।

इसलिए जरूरी है कि भारत ट्रम्प के शुल्कों का इस्तेमाल अपने फायदे में करे और शुल्क घटाए। इससे देश के उद्योग जगत और अर्थव्यवस्था को कई लाभ होंगे। दूसरे देश भी अमेरिका पर जवाबी शुल्क लगाते हैं या अपने शुल्क कम नहीं करते तो भारत के लिए निर्यात के नए बाजार हासिल करने का मौका होगा।

भारत को अपने उद्योग जगत की मदद के लिए शुल्क से इतर अन्य क्षेत्रों की तलाश करनी होगी। देश की औद्योगिक नीति को अब बचाव नहीं बल्कि सहारे के मंत्र पर चलना होगा। शुल्क और दूसरे अवरोधों के जरिये उद्योगों को बचाने के बजाय हमें अन्य तरीकों से कारोबारों की मदद की राह तलाशनी होगी।

अमेरिका के आर्थिक ढांचे में पूंजी बहुत है और भारत के पास किफयाती श्रम शक्ति है। अमेरिका तकनीक रूप से अत्यधिक कुशल है और भारत की प्रतिष्ठा प्रशिक्षित कर्मचारियों की है। अमेरिका में स्टार्ट अप की मजबूत व्यवस्था है और भारत की स्टार्टअप संभावनांए भी बेहतर हैं। दोनों अर्थव्यवस्थाएं एक दूसरे की पूरक हैं। भारत-अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते की संभावनाओं को देखें तो भारत इसे एक बड़े आर्थिक अवसर में बदल सकता है।

भारत को अपने बचाव के लिए नहीं बल्कि 2047 तक विकसित भारत बनाने के लिए कदम उठाने चाहिए।


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