बाढ़ में नदियों में बहती लकड़ियां, आपदा या तस्करी?
- सितम्बर 16, 2025
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हाल ही में हिमाचल प्रदेश की नदियों में बाढ़ के दौरान भारी मात्रा में लकड़ी के लठ्ठे और स्लीपर तैरते हुए देखे गए। सोशल मीडिया पर वायरल हुए इन वीडियो ने न केवल आम लोगों को चौंका दिया, बल्कि सुप्रीम कोर्ट का भी ध्यान इस मुद्दे की ओर खींचा। यह स्थिति सिर्फ हिमाचल प्रदेश की नहीं है, यमुना में भी इस तरह से लकड़ी नदियों में बह कर आई है। कुछ लोग बाढ़ के दौरान नदियों में बह कर आने वाली लकड़ी को पकड़ते हुए देखे गए।
यमुनानगर में भी बाढ़ के दौरान कम से कम 50 ऐसे लोग हथनी कुंड बैराज के नीचले इलाके में सक्रिय रहे। जो नदी में बह कर आने वाली लकड़ी को पकड़ते हैं। लकड़ी पकड़ने के काम में लगे एक व्यक्ति ने बताया कि बाढ़ के दिनों में उनकी टीम जिसमें की 10 से 15 सदस्य होते हैं, दो से तीन लाख रुपए की लकड़ी पकड़ लेते हैं।
लेकिन उन्होंने बताया कि यह लकड़ी बह कर कहां से आती है, उन्हें इसकी जानकारी नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने नदियों में बह कर आने वाली लकड़ी पर पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। अब हिमाचल में इस मुद्दे पर बहस छिड़ गई है।
प्रदेश के उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान ने भारतीय वन सेवा अधिकारियों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया। उनका कहना है कि आजकल वन अधिकारी जंगलों का निरीक्षण ही नहीं करते। केवल गार्डों के भरोसे जंगल छोड़ दिए जाते हैं। मंत्री के अनुसार, अगर पूरी की पूरी पेड़ जड़ों सहित बह जाते तो बात अलग थी, लेकिन कटे हुए लठ्ठे और स्लीपर नदियों में तैरते मिले हैं, जो साफ तौर पर अवैध कटाई की ओर इशारा करते हैं।
हालांकि वन विभाग का कहना है कि यह लकड़ियां क्लाउडबर्स्ट और फ्लैश फ्लड्स (24 से 26 अगस्त) के कारण ऊपरी कैचमेंट एरिया से बहकर आई हैं। विभाग ने प्राथमिक जांच में अवैध कटाई की कोई पुष्टि नहीं की है।
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