इस समय 4 ट्रिलियन डॉलर की भारतीय अर्थव्यवस्था को 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर पर पहुंचाने के लिए पूंजी और व्यापक विस्तार के अलावा भारतीय उत्पादों एवं इनकी गुणवत्ता में विश्वास होना भी उतना ही जरूरी है। इसलिए गुणवत्ता की अहमियत को प्रमुख ढांचा माना जाना चाहिए।

विभिन्न उत्पाद श्रेणियों में गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों (क्यूसीओ) का विस्तार करने का भारत सरकार का निर्णय इस लिहाज से महत्त्वपूर्ण है। गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए और बाजार में घटिया वस्तुओं का प्रवेश रोकने के लिए शुरू की गई यह रणनीति दोधारी तलवार मानी जाती है।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि क्यूसीओ केवल प्रशासनिक अधिसूचनाएं नहीं हैं बल्कि कानूनी जरिया है, जिनके अंतर्गत देश विदेश के विनिर्माताओं को अपने उत्पादों का बीआईएस प्रमाणन कराना होता है। ऐसा नहीं करने पर माल जब्त हो सकता है, जुर्माना लग सकता है या आयात रोका जा सकता है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि क्यूसीओ से घटिया उत्पादों की आवक कम हो जाती है और उन देशों से तो कम हो ही जाती है, जो डंपिंग के लिए बदनाम हैं। .

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2014 को भारतीय उद्योग जगत से ‘जीरो डिफेक्ट, जीरो इफेक्ट‘ यानी दोषरहित एवं पर्यावरण के अनुकूल विनिर्माण का आग्रह किया था। मगर क्या हम ऐसा कर पा रहे हैं?

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इस सवाल का जवाब इस बात में छिपा है कि क्या क्यूसीओ को मदद और सहारा देकर लागू किया जा रहा है या जोर-जबरदस्ती और जुर्माने से।

क्यूसीओ प्रक्रिया में बड़ी चिंता अनुपालन जांचने की भी है। अभी यह काम बीआईएस के ही जिम्मे है, जिसके पास काम का बहुत बोझ है, जिससे प्रक्रिया पूरी करने में बहुत समय लग जाता है और देसी-विदेशी आवेदक अटक जाते हैं।

क्यूसीओ न केवल नियामक हैं बल्कि वे हमारे इरादे के प्रतीक भी माने जाते हैं। मगर उनकी सफलता के लिए उनमें पैनापन होना, समावेशी रहना और बदलती दुनिया के हिसाब से ढलना भी जरूरी है।

हम गुणवत्ता का सफर रोक नहीं सकते और अगर क्यूसीओ दूरदर्शिता के साथ लागू किए जाएं तो वे ‘ब्रांड इंडिया‘ की बुनियाद तैयार कर सकते हैं।

 

सुरेश बाहेती 

9050800888


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