एनजीटी ने प्लाईवुड उद्योगों से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए राष्ट्रीय दिशा-निर्देश तैयार करने के लिए पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को निर्देश जारी किए
- जुलाई 3, 2025
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नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने प्लाईवुड निर्माण इकाइयों से होने वाले प्रदूषण को रोकने के उद्देश्य से व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए हैं। ट्रिब्यूनल ने हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एचएसपीसीबी), पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफ और सीसी) और उद्योगों द्वारा सख्त विनियामक कार्रवाई करने का आदेश दिया है।
यह मामला मई 2022 में यमुना नगर निवासी श्री सुमित सैनी द्वारा दायर एक पत्र से उत्पन्न हुआ था। आवेदक ने कई महत्वपूर्ण मुद्दों को रेखांकित किया हैः
- यह आरोप लगाया गया था कि अधिकांश कारखानों में उचित प्रदूषण नियंत्रण प्रणाली, जैसे मल्टी-साइक्लोन, वाटर स्क्रबर या बैग फिल्टर का अभाव है। यही कारण है कि फैक्ट्री की चिमनियों से निकलने वाला धुआं और राख आस-पास के आवासीय घरों की छतों पर जम रहा है, जिससे सांस संबंधी समस्याएं हो रही हैं।
- यूरिया और रसायनों से युक्त गोंद बनाने वाले अपशिष्ट सहित अनुपचारित औद्योगिक अपशिष्ट जल को बोरवेल के माध्यम से जमीन में छोड़े जाने का संदेह था, जो पीने के पानी के स्रोतों को दूषित कर रहा था।
- ‘‘फ्लाई ऐश‘‘ के निपटान के बारे में चिंता जताई गई।
- आवेदक ने आवासीय क्षेत्रों में कारखानों के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) जारी करने पर सवाल उठाया।

उद्योगों की प्रतिक्रिया इस प्रकार थीः
- उद्योग ईंधन के रूप में लकड़ी के कचरे का उपयोग करते हैं, जिससे ‘‘फ्लाई ऐश‘‘ नहीं बल्कि ‘‘लकड़ी की राख‘‘ उत्पन्न होती है।
- इस लकड़ी की राख को थैलों में एकत्र किया जाता है और स्थानीय किसानों को, भराव और समतलीकरण के लिए या निर्माण स्थलों के लिए ठेकेदारों को दिया जाता है।
- उद्योग के पास वैध सीटीओ और बोरवेल के लिए अनुमति है।
- उद्योग के परिसर में वृक्षारोपण किया गया है।
- उद्योग पर्यावरण मानदंडों का अनुपालन करता है।
न्यायाधिकरण ने लकड़ी आधारित उद्योगों के विनियमन और उसके बाद पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा लकड़ी आधारित उद्योग (स्थापना और विनियमन) दिशानिर्देशों के संबंध में टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुलकपद मामले में सर्वाेच्च न्यायालय के निर्देशों का उल्लेख किया। इसने प्लाईवुड उद्योगों के लिए ब्च्ब्ठ के ‘‘ऑरेंज‘‘ श्रेणी वर्गीकरण (प्रदूषण सूचकांक 78.3) को भी नोट किया, जो महत्वपूर्ण प्रदूषण क्षमता को दर्शाता है, जैसेः
- बॉयलर, लकड़ी काटने, एड्हेसिव उपयोग (फॉर्मेल्डिहाइड उत्सर्जन) से वायु प्रदूषण।
- लॉग भिगोने, रासायनिक निक्षालन और रेजिन धोने से जल प्रदूषण।
- संग्रहीत लकड़ी के कचरे और रसायनों से मिट्टी का संदूषण।
- फॉर्मेल्डिहाइड, एड्हेसिव में इस्तेमाल किया जाने वाला एक मानव कार्सिनोजेन है, जो श्रमिकों के लिए जोखिम पैदा करता है। लकड़ी की धूल और हाइड्रोकार्बन धुएं से श्वसन संबंधी समस्याएं हो सकती हैं।

रेजिन प्लांट के लिए पर्यावरण मंजूरीः
ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि कैप्टिव रेजिन प्लांट (फेनोल फॉर्मेल्डिहाइड, यूरिया फॉर्मेल्डिहाइड, आदि का निर्माण) वाली प्लाईवुड इकाइयाँ EIA अधिसूचना 2006 के अंतर्गत आती हैं और उन्हें पूर्व पर्यावरण मंजूरी (EC) की आवश्यकता हो।
लकड़ी की राख का निपटानः
एनजीटी ने अपने रुख को दोहराया कि निचले इलाकों में राख का निपटान अनुचित है और एचएसपीसीबी को लकड़ी की राख के प्रबंधन के लिए एक एसओपी (मानक संचालन प्रक्रिया) विकसित करने का निर्देश दिया, जो थर्मल प्लांट से निकलने वाली फ्लाई ऐश के लिए तंत्र के समान है।
यह ऐतिहासिक निर्णय पर्यावरण नियमों को सख्ती से लागू करने के लिए एनजीटी की प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है। यह एचएसपीसीबी पर मेहनती निगरानी और प्रवर्तन के लिए और प्लाईवुड उद्योगों पर स्वच्छ प्रथाओं को अपनाने के लिए महत्वपूर्ण जिम्मेदारी डालता है।
पर्यावरण और वन मंत्रालय को राष्ट्रीय दिशा-निर्देश तैयार करने का निर्देश देश भर में इस क्षेत्र के लिए मानकीकृत पर्यावरण मानदंडों की ओर कदम बढ़ाने का संकेत देता है।
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