एमपी सिंह

भारत अब क्वालिटी कंट्रोल को लेकर सजग हो रहा है। जीरो डिफेक्ट उत्पाद के लिए भारत काम कर रहा है। इसी को ध्यान में रख कर क्यूसीओ लागू किए गए हैं। इसमें एक साल का समय दे दिया गया है। जिसमें सभी को एक मौका दिया गया है, ताकि हर कोई अपनी तैयारी पूरी कर सके। और जो बदलाव करना हैं, तैयारी करनी है, वह आसानी से की जा सके।

क्यूसीओ से उपभोक्ताओं को बहुत लाभ मिलेगा। उन्हें उचित गुणवत्ता का उत्पाद मिलेगा। उद्योग को भी इससे लाभ होगा। क्योंकि उन्हें अब उत्पाद के तय गुणवत्ता मानक के अनुसार ही क्वालिटी बनानी होगी। पड़ोसी और उन देशों को भी अब इसके लिए तैयारी करनी होगी। जिन्हें भारत में माल निर्यात करना है।

भारतीय और विदेशी प्लाईवुड निर्माताओं को बीआईएस मानकों के अनुरूप प्लाईवुड की गुणवत्ता को लाना होगा।

भारत के प्लाईवुड में एग्रोफोरेस्ट्री से आने वाली लकड़ी को प्रयोग किया जा रहा है। नेपाल और वियतनाम के प्लाईवुड व लकड़ी उत्पादक जो लकड़ी का प्रयोग करते हैं, उसका स्त्रोत क्या है, उसके गुण धर्म क्या है, इस पर चर्चा की जानी चाहिए।

डॉ सीएन पांडे

QCO उद्योगों के लिए अपनी गुणवत्ता सुधारने का एक मौका लेकर आया है। हालांकि इस मौके को हम भुनाने में चूक गए थे, लेकिन अब हम सभी मिल कर इस दिशा में एक प्रयास करेंगे जिससे इस मौके का लाभ उठाया जाए।

फब्व् की जब घोषणा हुई थी तब इंडस्ट्री में हाहाकार मच गया था। हर कोई यह सोच रहा था कि अब प्लाईवुड उद्योग का भविष्य खतरे में है। यह सवाल बार बार उठ रहा था कि जो उत्पाद तय मानकों पर खरा नहीं उतरेगा उसका क्या होगा? क्योंकि इस तरह के उत्पाद की संभावना दस से 15 प्रतिशत आंकी गई थी। इसे लेकर डायरेक्टर आईडब्ल्यूएसटी के साथ टेक्निकल कमेटी बैठक करती थी, तो इसमें इस बात पर चर्चा होती थी कि गुणवत्ता मानकों पर खरा न उतरने वाले उत्पाद का क्या किया जाए?

क्योंकि यदि इसे बाजार में नहीं बेचा जा सकेगा तो फिर उत्पादन लागत बढ़ जाएगी। इस तरह के तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हमने लगातार वेबिनार किए। तकनीकी कमेटी से चर्चा की। इसमें विचार विमर्स किया गया कि इस समस्या का कारण क्या है और इसका हल क्या निकल सकता है।

इसमें कई तथ्य सामने आए

प्रत्येक क्षेत्र में अलग अलग किस्म की लकड़ी उपयोग की जा आ रही है, सबकी गुणवत्ता अलग-अलग है, क्योंकि वैरायटी अलग अलग है।

हर लकड़ी के अपने अलग गुण व तत्व होते हैं। ऐसे में जो प्लाईवुड उत्पाद तैयार होगा उसकी गुणवत्ता भी अलग अलग होगी। ऐसे में कैसे ऐसे मानक तैयार हो कि हर तरह की लकड़ी से तैयार उत्पाद गुणवत्ता मानकों पर खरा उतर सके।

  1. कच्चा माल कहीं कहीं अपेक्षाकृत सस्ता होता है। ऐसे में उत्पादन लागत कम या ज्यादा हो सकती है।
  2. भाव में उतार चढ़ाव भी बड़ी चुनौती है। इससे उत्पादन लागत कम करने की कोशिश में गुणवत्ता से समझौता हो सकता है।

देखा गया कि जो मानक है, वह बहुत पुराने हैं। करीब 20 से 25 साल पुराने मानक है। उसमें तत्काल बदलाव करने की आवश्यकता महसूस हुई। यह बदलाव करने से पहले प्लाईवुड उत्पादकों से व्यापक पैमाने पर बातचीत की गई, विशेषज्ञों को इस चर्चा में शामिल किया गया। इसका उद्देश्य यह था कि एक ऐसा मानक तय किया जाए, जो देश भर के प्लाईवुड निर्माताओं के अनुकूल हो। देश भर के प्लाईवुड निर्माताओं ने इस बातचीत में अपने अपने विचार दिए। यमुनानगर, पंजाब व उत्तर प्रदेश समेत देश भर से हमने विचार लिए। इसमें यह ध्यान रखा गया कि कम से कम गुणवत्ता को आवश्यक स्तर तक लेकर जाया जाए, हालांकि अभी भी इसमें कुछ कमियां है, इस बारे में समय समय पर सुधार होते रहेंगे। यह एक साल की कोशिशों का परिणाम है कि एक संतोषजनक गुणवत्ता मानक हमारे पास है।

हमारी कोशिश यह है कि अब हमारे बाजार में जो भी उत्पाद आए, वो इन मानकों के मुताबिक हो। फोर्मलडीहाइट की शर्त को भी इसमें शामिल किया गया। लेकिन यह ध्यान भी रखा गया कि उद्योगपति इन मानकों को आसानी से पूरा कर सके।

जब मानक लागु करने का वक्त आया तो कई एसोसिएशन ने यह मांग रखी कि मानकों को लागू करने में समय दिया जाए। क्योंकि बहुत सी यूनिट अभी बीआईएस दायरे से बाहर है। इसलिए एक साल का समय दिया गया। एक साल का समय काफी है। इस अवधि में हम बीआईएस प्रमाण पत्र ले सकते हैं और अपने उत्पाद को मानकों के अनुरूप तैयार कर सकते हैं।

दिक्कत यह आ रही कि उद्योगपतियों में जिस तेजी से कार्यवाही होनी चाहिए थी, वह तेजी देखने को नहीं मिल रही है। जहां तक नेपाल के प्लाइवुड की बात है, उनका उत्पाद BIS के गुणवत्ता पर कहां टिकता है, यह तो टेस्टींग के बाद ही पता चलेगा। उनको तकनीकी समस्या कुछ अधिक आएगी, जो कि स्वाभाविक है।

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सवाल यह है कि हम मानक बनाते क्यों है? इसके पीछे सोच यह है कि गुणवत्ता को लेकर एक पैमाना होना चाहिए। जिससे उपभोक्ताओं को उचित मानको का उत्पाद मिलना संभव हो सके।

उपभोक्ता अभी इतने जागरूक नहीं हैं कि स्वयं से गुणवत्ता तय कर लें। इसलिए ऐसे मानको को बनाने की आवश्यकता है। जिससे उपभोक्ता निश्चिंत होकर गुणवत्ता पूर्ण उत्पाद खरीद सकें।

इसलिए उद्योगपतियों को चाहिए कि वह जितनी जल्दी हो, इन मानको के अनुसार काम करना शुरू कर दें, क्योंकि अब और आगे समय मिलने वाला नहीं है।

एमडीएफ और पार्टिकल बोर्ड के मानक भी अब तय होने जा रहे हैं। जहां तक दस प्रतिशत उत्पाद जो तय मानकों में नहीं आता, इस पर अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।

बीआईएस में जो बदलाव किया गया है, इसे देखते हुए रिजेक्शन की मात्रा कम होने की संभावना है।

होम प्रसाद घिमिरेः भारत और नेपाल की कला, संस्कृति व रहन सहन में काफी समानता है और एक दुसरे से जुड़े हुए हैं। भारत की कई कंपनियों ने नेपाल में निवेश कर रखा है। जिनकी नेपाल में पावर सेक्टर, सर्विस में बड़ी भूमिका है।

नेपाल कच्चे माल में लकड़ी को छोड़कर बचे हुए सभी तरह के उत्पाद के साथ साथ प्लाइवुड मशीनरी भारत से आयात करता है। लेकिन नेपाल के प्लाईवुड का भारत में बड़ा बाजार है। हम भारत के गुणवत्ता मानकों से सहमत है। इन मानकों पर पूरा उतरने के लिए हम लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराने का काम शुरू कर दिया है। हालांकि हमारी यूनिट का अभी तक निरीक्षण नहीं हुआ। नेपाल में 70 के आस पास यूनिट है, जो कि किसी भी भारत के औसत फैक्ट्री से भी छोटी है।

नेपाल दस हजार करोड़ का माल भारत से खरीदता है, लेकिन सिर्फ एक हजार करोड़ का निर्यात ही भारत में कर रहा है। जिसमें प्लाईवुड का बहुत छोटा सा हिस्सा है। फिर भी भारत ने जो मानक तय किए हैं, उन्हें अपनाना ही होगा। भारत की हर नीति को हम मानते हैं। हम पूरी कोशिश करेंगे कि भारतीय मानकों के अनुसार प्लाईवुड तैयार करें।

चंपालाल एल बोथराः बीआईएस को लेकर नेपाल उत्सुक है। यहां के उद्योगपति भी गुणवत्ता को लेकर जागरूक है। अपनी यूनिट के रजिस्ट्रेशन के लिए काम पहले से शुरू हो गया है। नेपाल से भारत में दो सौ करोड़ की प्लाईवुड ही निर्यात की जाती है। हमारी दिक्कत यह है कि बीआईएस में सर्टिफिकेट के लिए आवेदन कर दिया है। लेकिन अभी तक बीआईएस की ओर से निरीक्षण नहीं किया गया है।

एम पी सिंहः आपके पास जो लकड़ी आ रही है, वह कहां से आ रही है?

चंपालाल एल बोथराः यहां पर उतिस की लकड़ी की खेती पहाड़ पर होती है। अब यहां सफेदा और पॉपुलर की खेती का उत्पादन भी शुरू हो रहा है। फिर भी अभी उतिस की लकड़ी का प्रयोग सबसे ज्यादा हो रहा है। इसकी डेनसिटी लगभग 500 से 600 हैं। इसमें बोरर नहीं लगता। क्योंकि यह लकड़ी जड़ी बुटी के साथ ही उगती है।

एम पी सिंहः कितने साल में लकड़ी कटने के लिए तैयार होती है

चंपालाल एल बोथराः यह लकड़ी पांच से छह साल के बीच तैयार हो जाती है। इसका गर्थ 24 इंच से लेकर 50-60 इंच होता है। इसकी फिनिशिंग अच्छी होती है। अभी भारत में भी इस लकड़ी की कोर का निर्यात हो रहा है।

देवानंद सरावगीः क्यूसीओ लागू होने से उद्योग में बहुत अच्छी प्रथाएं लागू होने वाली है। भारत के साथ साथ नेपाल उद्योग भी अपनी क्वालीटी में सुधार करेगा और BIS के अनुसार ही अपना माल तैयार करेंगे। हमारी ज्यादातर यूनिट संचालकों ने आवेदन भी कर दिया है। इन सभी यूनिटों में प्रयोगशाला भी स्थापित हो गई है। लेकिन बी आई एस की ओर से इन्सपेक्सन या फैक्ट्री विजीट के लिए कोई सूचना प्राप्त नहीं हुई है। जो हमें चितिंत कर रही है।

हम बीआईएस और भारत सरकार के साथ साथ, भारतीय जनता से भी आग्रह करना चाहते है कि नेपाल के उद्योगपतियों से सहानुभुतिपूर्वक व्यवहार करें।

जहां तक नेपाल के यूनिटों में क्वालिटी की बात है, वह सभी आज सक्षम है, बीआईएस के सभी मानको को मानते हुए उनके अनुरूप उत्पाद तैयार कर सकते हैं। इससे हमारे उद्योग को क्वालिटी में और भी सुधार करने का लाभ ही होगा। नेपाल में भी ठप्ै की तरह नेपाल स्टैंडर्ड है। क्या यह संभव है कि ठप्ै नेपाल स्टैंडर्ड से मिल कर यहां ही उत्पाद की जांच कर ली जाए?

नेपाल स्टेंडर्ड के मानकों के अनुरूप तो हम उत्पाद तैयार कर ही रहे हैं। दूसरी बात यह है कि बीआईएस की प्रयोगशाला दूर दराज है। यदि नेपाल में भी एक प्रयोगशाला बना दी जाए, जिसे भारत के तकनीकी विशेषज्ञ इसे चलाए। ताकि हमारे उत्पाद की टेस्टींग जल्द हो जाए।

बीआईएस के नए मानक भी बनाए जा रहे हैं। यह नए मानक कब तक आएंगे। यदि यह आते हैं तो जो आवेदन पहले दिए गए, क्या नए मानको में यह पुराने आवेदन मान्य होगा, या नहीं।

इन नए मानकों का सकारात्मक या नकारात्मक प्रभाव क्या आएगा?

बीआईएस का प्रमाण पत्र हमें कैसे आसानी से मिल सकता है, इस बात पर भी प्रकाश डाला जाए। इसके लिए हमें क्या करना चाहिए।

एमपी सिंह

यह दो देशों का नीतिगत मुद्दा है, जिसे दोनों देशों के सरकारी प्रतिनिधि ही सुलझा सकते हैं। उसी तरह बीआईएस व नेपाल स्टैंडर्ड मिल कर काम करने की बात है, इसके लिए भी उच्च राजनीतिक स्तर पर ही निर्णय लिया जा सकता है।

जहां तक नये लायसेंस वितरण की बात है, इसमें भारतीय उद्योगपतियों को भी समय लग रहा है। क्योंकि बीआईएस की अनिवार्यता कई उत्पादों पर एक साथ लागु कर दिया गया है। इस वजह से इतनी बड़ी संख्या में लायसेंस के आवेदन आ गए हैं। इसलिए समय लग रहा है जो कि एक स्वाभाविक प्रक्रियागत तथ्य है।

विदेशी कंपनियों में जब टीम निरीक्षण के लिए जाएंगी तो उसके लिए परमिशन आदि लेने में भी वक्त लग सकता है। इसलिए आप अपने स्तर पर प्रयास करें। अपने नेताओं व अधिकारियों से बातचीत करें।

क्योंकि हमारे स्तर पर इस दिशा में हम ज्यादा प्रभावी नहीं हो सकते हैं। हम समझ सकते हैं कि आपके पास मजदूर है, कच्चा माल है। आप अच्छा माल बनाने में सक्षम है। जहां तक व्यवस्था की बात है, इसमें कुछ समय लग सकता है।

जो नए मानक है, उनके नोटिफिकेशन हो रहे हैं। जहां तक मानकों पर क्लियरिटी की बात है, समय के साथ इसमें स्पष्टता आएगी। जो आवेदन हो चुके हैं, इसका असर उन पर नहीं पड़ेगा।

अभिषेक चितलांगियाः

भारत ग्लोबल पावर बनने जा रहा है। यह भारत के लिए गौरव की बात है कि हम लकड़ी के उत्पादों में गुणवत्ता मानक तय करने जा रहे हैं। भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर की गुणवत्ता के उत्पाद तैयार कर विश्व स्तर पर अपने उत्पादों को रख सकता है। अब तो यह उम्मीद करनी चाहिए कि जल्द से जल्द गुणवत्ता मानक लागू कर दिए जाए। भारत को यदि विश्व की लकड़ी का प्रयोग करना है तो उसके गुणों को समझना होगा।

नेपाल व वियतनाम के उत्पादों ने भारत में अपनी पैठ काफी गहरे बना ली है। विदेशी से जो अच्छी क्वालीटी का माल आता है उससे भारत के बाजार को कोई परेशानी नहीं है। दिक्क्त तो उन गुणवत्ता विहीन उत्पादों से आती हैं जो सिर्फ सस्ता होने की वजह से बाजार को डिस्टर्व करते हैं और उपभोक्ताओं से छल। ऐसे उत्पाद देश में भी बन रहें है और बड़ी मात्रा में आयात भी हो रहें है। इन सस्ते उत्पादों पर ही हमें लगाम लगाना है। और इसलिए फब्व् को लागु करना देशहित में अति आवश्यक हो रहा है।

चुनौती हमेशा रहती है। इससे निपटना ही होगा। क्योंकि जब आप व्यक्तिगत तौर पर विकसित होंगे तो संपूर्ण उद्योग का विकास होगा। मैं समझता हूं कि एक साल के भीतर भीतर मानक लागू हो जाएंगे। ऐसा नहीं है कि हम तब आवेदन करें जब तय समय सीमा खत्म हो रही हो। हमें आज से ही काम करना चाहिए। हमें अब अतिरिक्त समय नहीं मांगना चाहिए। हालांकि सरकार ने भी स्पष्ट तौर पर कहा है कि अब उत्पादकों को इसके बाद कोई समय की छूट नहीं दी जाएगी।

डॉ सीएन पांडे

आप बीआईएस मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला में उत्पाद के सैंपलों की जांच करा सकते हैं। आईडब्ल्यूएसटी की भी प्रयोगशाला है, जो मान्यता प्राप्त है। यहां से उत्पाद की जांच करवा कर आईएसडब्ल्यूएसटी से प्रमाण पत्र ले सकते हैं।

एमपी सिंह

निश्चित ही यह तो पहला कदम है। यह तो करना ही चाहिए। अच्छा तो यह है कि आप अपने उत्पाद के सैंपल की जांच करा कर उसका प्रमाण पत्र लें लें।

नेपाल की प्रयोगशाला को बीआईएस मान्यता मिलेगी, ऐसा मुश्किल प्रतीत होता है। अब हमें सिर्फ यह कोशिश करनी चाहिए कि मानकों के अनुरूप कैसे उत्पाद तैयार किया जाए। बीआईएस से संपर्क करने के लिए किसी न किसी को आपको यह जिम्मेदारी देनी होगी। उनके साथ एमओयू करना होगा। क्योंकि यह समस्या आएगी, यह सभी को आती है।

हम भी यदि भारत से यूएस या यूरोप आदि में अपना उत्पाद बेचना चाहते हैं तो इस तरह की समस्या आती है। हर देश का अपना अपना तरीका होता है, इसलिए इसमें कुछ न कुछ बाधा तो आती है।

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प्रमोद चौधरीः सरकार से सरकार के बीच जो बातचीत होनी है, इसमें काफी समय लग सकता है। इसलिए प्रमाण पत्र के लिए जो भी बदलाव करने हैं, हम इसके लिए तैयार है। प्रमाण पत्र लेने की प्रक्रिया के लिए दिल्ली में कोई हेल्प डेस्क बन जाए। जो हमारे प्रमाण पत्र के काम को आसान कर सके। दिल्ली की प्रयोगशाला में नेपाल के उद्योगपति अपने उत्पाद के सैंपल की जांच करा सके।

मानकों में जो बदलाव हुए हैं, वह पता चल जाए। लायसेंस मिलने में सात से आठ माह लग जाएंगे। इसमें जो देर लग रही है। मुझे लगता है इससे हमारा निर्यात प्रभावित हो सकता है। ऐसे में बीआईएस अपने स्तर पर क्या कुछ सहुलियत हमें दे सकता है।

एम पी सिंहः बीआईएस अभी असीमित काम के दबाव में हैं। अचानक बहुत जयादा आवेदन आ गए हैं। इसलिए समय लग रहा है। इसके लिए आपको बीआईएस से बातचीत स्वयं करनी होगी। क्योंकि हम आपकी बातचीत को बीआईएस तक नहीं ले जा सकते हैं। आपके मुद्दे आप स्वयं ही बीआईएस के पास लेकर जाऐं। आप चाहे तो प्लाइवुड एसोसिएशन या प्लाइवुड निर्यात एसोसिएशन से बातचीत करें।

जहां तक हमारी बात है, हम आपके सैंपल की जांच में तेजी ला सकते हैं। जहां तक मानक में बदलाव की बात है, इसमें ज्यादा बदलाव नहीं है। चीजों को बहुत ही सरल किया गया है।

श्रीनिवासः वेयतनाम से 14 करोड़ का माल हर माह भारत में निर्यात हो रहा है। जब भी भारत में कच्चे माल की समस्या आती है,तब वियतनाम से कच्चा माल भारतीय उत्पादक आयात करते हैं। निर्यात के लिए वियतनाम के मानक अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है। बीआईएस के तहत हमने आवेदन कर दिया है। हम चाहते हैं कि यह काम आसान हो।

मनोज ग्वारी

नेपाल में प्लाइवुड उद्योग का ढांचागत सुविधा ठीक है। उनके पास उतिस नाम की लकड़ी है। जो पापुलर के बराबर ही है। वैसे तो इस लकड़ी से तैयार प्लाइवुड संतोषजनक गुणवत्ता की है। नेपाल प्लाइवुड एसोसिएशन को उतिस के वैज्ञानिक डाटा और शोध करवाना चाहिए। जिससे यह साबित किया जा सके कि उतिस के गुण कैसे है? भारत में यह धारणा है कि उतिस की लकड़ी कमजोर होती है, जिस से प्लाइवुड की गुणवत्ता प्रभावित होती है। इस मिथ को खत्म किया जा सकता है। नेपाल में युकेलिप्टिस की खेती भी बडे़ पैमाने पर हो रही हैं। आने वाले समय में नेपाल में एग्रोफॉरेस्ट्री में भी बेहतर काम होगा। नेपाल में गर्जन का विकल्प भी है।

वियतनाम में लकड़ी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। युकेलिप्टिस वहां पर्याप्त है। वहां लकड़ी सरकार ही काटती है। वहां कोल्ड प्रेस पर ही अधिक काम हो रहा है। केलिब्रेटिड सिस्टम पर काम करते हैं। उनकी उत्पादन प्रक्रिया भारत से थोड़ी अलग है।

नेपाल का बड़ा बाजार भारत है। घरेलू स्तर पर नेपाल में लकड़ी की डिमांड कम है। इसलिए नेपाल को भारत में माल बेचने के लिए क्यूयूसीओ मानकों के अनुरूप ढ़लना जरूरी हो गया है।

एम पी सिंहः जब बाहर की लकड़ी भारत में टेस्ट होती है तो इसके लिए वहां के लोग इस सैंपल का प्रोजेक्ट सपोंसर करते हैं। हम इसके अलग अलग उत्पाद बना कर इसकी जांच करते हैं। लकड़ी का प्रमाण पत्र ही नहीं लेंगे तो काम नहीं चलेगा। क्योंकि यह तय होना चाहिए कि लकड़ी के मूल तत्व क्या है? वह रिपोर्ट आप हमारे संस्थान से ले सकते हैं।

हेम प्रसादः नेपाल से भारत में कोर विनियर भी जा रहा है। क्योंकि इसकी स्ट्रेन्थ अच्छी है। हम 15-20 सालों से प्लाईवुड निर्माण में हैं। नेपाल का प्लाईवुड अपेक्षाकृत कम गुणवत्ता का है यह धारणा सही नहीं है। BIS का लायसेंस मिलने पर हमारे प्लाईवुड की टेस्टींग की जाएगी तभी सारी स्थिती क्लियर हो जाएगी। अगर हमें कोई कमी मिलेगी तो निश्चित ही हम उसमें आवश्यक सुधार करेंगें। हमारे पास उतिस की लकड़ी के साथ साथ गर्जन के विकल्प के तौर पर चिनौली लकड़ी है। इसका उपयोग चौखट बनाने में भी किया जाता है। उतिस प्राकृतिक तरीके से हमारे यहां उगता है। यह सही है कि इसके प्रमाणिक तथ्य की जांच जरूरी है।

एम पी सिंहः निश्चित ही आप अपनी लकड़ी के सैंपल की जांच करा लें। अलग-अलग किस्मों की लकड़ी की जांच करानी चाहिए। जापान भी अपनी हर तरह की लकड़ी की जांच करा कर उसकी रिपोर्ट लेते हैं।

मनोज ग्वारी

नेपाल के उद्योगपतियों ने दिसंबर में ही BIS में आवेदन कर दिया था। और उनकी अर्जी बीआइएस ने स्वीकार भी कर लिए हैं। कुछ उद्योगपतियों को यह पत्र जनवरी में गया है कि अब उनकी यूनिट की जांच के लिए दौरे की फीस जमा करा दें। जैसा कि डा. सिंह ने बताया कि एक साथ अधिक आवेदन आने से प्रक्रिया में देर हो रही होगी। हो सकता है कि चुनाव के लंबे दौर की वजह से भी देर हो रही हो।

भारत मानक ब्यूरो उद्योगों से फीड बैक लेकर ही मानक तैयार करता है। उद्योगों की सलाह और उत्पाद की न्यूनतम आवश्यकता को देख कर कोई एक मानक तय किया जाता है। जो जांच दल यूनिट में आएगा, वह उन प्रस्तावित मानकों के अनुरूप ही आकलन करेगा। यह बहुत ही सामान्य व आसान प्रक्रिया है। क्यूसीओ के आवेदन में भारत के उद्योगपति को एक माह के भीतर प्रमाण पत्र मिल जाएगा। ऐसा दावा किया गया था, लेकिन हुआ नहीं है।

लेकिन नेपाल या विदेशों के लिए इस प्रक्रिया में थोड़ा अधिक समय लगता है। पहले यूनिट में दौरा किया जाएगा, वहां से सैंपल लेकर उसके रिजल्ट पर प्रमाण पत्र दिया जाएगा। नेपाल के उद्योगपतियों ने आईएस 303, 1960 के मानकों के आधार पर आवेदन किया है।

अभी नए मानक प्रकाशित होने की प्रक्रिया में हैं। 4990 व 710 के मानक वेबसाइट पर प्रकाशित हो चुके हैं। यह बदलाव उद्योग के हित में हैं। इसे एक जिम्मेदारी उद्योगपति द्वारा आसानी से पूरा किया जा सकता है। अभी हमारे पास आठ माह का समय बचा है। चुनाव की वजह से अभी कामकाज की रफ्तार कम हे। एक जुलाई से सरकारी कामकाज में सामान्य होने की संभावना है। फरवरी 2025 के अगले तीन माह तक नेपाल को निर्यात करने में दिक्कत आ सकती है। इसकी वजह यह है कि बीआईएस के पास 250 से ज्यादा उत्पाद है, जिनका क्यूसीओ लागू करना है। बीआईएस के पास काम करने वाला स्टाफ सीमित है। जब भी किसी दूसरे देश में बीआईएस निरीक्षण के लिए जाता है तो कम से कम एक यूनिट के लिए तीन दिन का समय दिया जाता है।

जहां तक वियतनाम की बात है, यहां अभी कोई शुरुआत नहीं हुई। जुलाई में किसी यूनिट का निरीक्षण होता है तो सैंपल अगस्त में भारत आएगा। एक सैंपल की जांच में दो से ढाई माह का समय लग जाएगा। सैंपल आने के बाद फिर लाइसेंस की प्रक्रिया में भी इतना ही समय लग जाएगा।

सुरेश बाहेती

प्लाइवुड उद्योग इन दिनों चुनौतियों से गुजर रहा है। वह चाहे भारत का हो या नेपाल का। जरूरी यह है कि भारत और नेपाल दोनों देशों के उद्योगपति BIS के मानकों को माने। और अपनी क्वालिटी को मानकों के अनुरूप बनाएं। यदि मानक और गुणवत्ता एक जैसे हो जाते हैं तो दोनो देशों के लिए एक समान प्रतिस्पर्धात्मक प्लेटफार्म उपलब्ध होगा। आपका उत्पाद क्योंकि सस्ता है, इसकी वजह चाहे जो भी हो। गुणवत्ता के स्तर पर है या फिर सस्ते कच्चे माल की वजह से सस्ता है। इस वजह से उत्तरी भारत के प्लाईवुड निर्माता नेपाल के प्लाईवुड से दिक्कत महसूस करते हैं। जब मानक एक बराबर हो जाएंगे तो इस तरह की दिक्कत अपने आप ही दूर हो जाएगी।

सीता रामः बीआईएस जितनी तेजी से हमारे उत्पादों को प्रमाणित करने का काम करेगी तो दोनों देशों के माल की तुलना आसान होगी।

गजेंद्र राजपूत

कीमतों में अंतर की वजह से भारतीय प्लाईवुड बाजार नेपाल और वियतनाम की प्लाईवुड की गुणवत्ता पर सवाल उठाते रहते हैं। उनकी गुणवत्ता वैसे तो अपने आप में ठीक है। क्योंकि हर उद्योग में उच्च व न्यून गुणवत्ता का माल बनता है।

उत्पाद में थोड़ी बहुत दिक्कत तो किसी भी फैक्ट्री में कभी भी हो सकती है, इसे दूर किया जा सकता है। परेशान होने की बात नहीं है। मानक पूरे किए जा सकते हैं। हां, अनुपालन की दृढ़ ईच्छा रखना अनिवार्य है।

सुभाष जोलीः वक्त आ गया, हमें गुणवत्ता पर बातचीत करनी चाहिए। गुणवत्ता युक्त उत्पाद ही उपभोक्ताओं तक पहुंचाने चाहिए। भारत ने इस दिशा में जो पहल की है, यह निश्चित ही इस दिशा में बड़ा प्रयास है।

QCO लागु होने के बाद, प्लाईवुड, चाहे वह भारत के किसी भी राज्य की हो, चाहे वह विदेश के किसी भी देश की हो उनकी Quality का पैमाना एक ही हो जाएगा। जो कि उद्योग और उपभोक्ता दोनों के लिए हितकर होगा।

हमारा यह प्रयास हमेशा रहता है कि प्लाइवुड उद्योग नई नई बुलंदियों को छुए। बीआईएस लाइसेंस की प्रक्रिया में तेजी ला रहा है। उम्मीद है आने वाले दिनों में ज्यादा से ज्यादा उत्पादकों के पास BIS लाइसेंस होगा।


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