वैश्विक विनिर्माण में चीन का दबदबा है। फिलहाल वह वैश्विक उत्पादन में 32 फीसदी का हिस्सेदार है। अमेरिका, जापान, जर्मनी, भारत और दक्षिण कोरिया क्रमशः 16, 7, 5, 3 और 3 फीसदी के हिस्सेदार हैं।

चीन दुनिया का सबसे बड़ा कारोबारी है और अब तक वह दुनिया में विनिर्मित वस्तुओं का सबसे बड़ा निर्यातक भी है। इसमें चीनी और विदेशी दोनों कंपनियां शामिल हैं। दुनिया कारोबार के इस प्रकार चीन में केंद्रित होते जाने को ध्यान में रखते हुए उसमें विविधता लाना चाहती है।

चीन विनिर्माण का अहम स्रोत है लेकिन भारत समेत अन्य देश उस दूसरे देश का स्थान लेना चाहते हैं जो चीन का विकल्प बनेगा।

‘नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’:

क्या किया जा सकता है? भारत का अंतिम लक्ष्य स्पष्ट हैः समान सोच वाले देश अधिक से अधिक संख्या में नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का पालन करें ताकि उन पर नियम पालन का दबाव हो। परंतु जहां हमारा अंतिम लक्ष्य महत्त्वाकांक्षी होना चाहिए वहीं हमें धीरे-धीरे कदम बढ़ाने की जरूरत हैं। नियम आधारित व्यवस्था में तब दिक्कत आती है जब ये नियम तोड़े जाते हैं।

अंतरराष्ट्रीय मामलों में इसका अर्थ है क्षेत्र पर राष्ट्रीय संप्रभुता सबसे पवित्र है। व्यापार में नियम ऐसे शुल्क को रोकते हैं जो विभिन्न देशों के बीच भेद करते हैं।

तीन सिद्धांतों का पालन होना चाहिए

पहला, किसी विषय पर समूह के सभी देशों के सहमत होने की उम्मीद न करें। इसके बजाय, दुनिया के तीन-चार समान सोच वाले देश सहयोग के क्षेत्रों पर एकजुट हों और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करें।

दूसरा, एक खास क्षेत्र में नियम बनाने के बाद यह सुनिश्चित किया जाता है कि सभी देश स्पष्ट हों और इस पहल के स्वागत में सक्रिय हों।

लक्ष्य है समावेशी और भागीदारी वाली व्यवस्था कायम करना।

तीसरा, इसमें शामिल होना स्वैच्छिक है लेकिन एक बार किसी पहल में शामिल होने के बाद नियमों पर टिके रहना होता है, फिर चाहे वे किसी खास व्यक्ति या खास मुद्दे पर किसी के पक्ष में हों या नहीं।

क्या यह कारगर हो सकता है?

हमें कई क्षेत्रों में विकल्प तलाशने होंगे ताकि हम विश्व में अपनी भूमिका निभा सकें।


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