इस समय कच्चे माल खासतौर पर लकड़ी के दाम किस स्तर पर है

इस समय लकड़ी पहले की तुलना में कुछ सस्ती हुई है। यह ट्रेंड अचानक नहीं आया बल्कि धीरे-धीरे बना। बारिश के समय भी माल की सप्लाई ज्यादा रही और बाजार में पर्याप्त स्टॉक मौजूद था। आमतौर पर बारिश में कटाई और सप्लाई प्रभावित होती है, जिससे दाम ऊपर जाते हैं। लेकिन इस बार उल्टा हुआ - माल इतना ज्यादा आया कि कीमतें नीचे आ गईं। अभी हालात यह हैं कि टॉप क्वालिटी का जो माल बाजार में है वह लगभग 1400 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास मिल रहा है। अच्छी क्वालिटी का एवरेज माल 1200 से 1250 रुपये में उपलब्ध है। कच्चे माल की उपलब्धता को लेकर हम भविष्य के प्रति सकारात्मक हैं। उम्मीद है आने वाले समय में स्थितियों में और ज्यादा सुधार आएगा।

इसका मतलब है कि सप्लाई ज्यादा और डिमांड कम है?

बाजार का यही नियम है-अगर माल ज्यादा होगा और लेने वाले कम, तो दाम गिरेंगे। इस बार यही हुआ है। साथ ही यह भी सही है कि ग्राहक या खरीदार अभी थोड़ा पीछे हटे हुए हैं। कई लोग इंतजार कर रहे हैं कि दाम और नीचे जाएं। यह भी बाजार में दबाव बनाता है।

क्या आपको लगता है कि यह गिरावट लंबे समय तक चलेगी?

देखिए, बाजार की भविष्यवाणी करना हमेशा कठिन होता है। लेकिन मेरे हिसाब से इस बार कीमतें कुछ दिन ऐसे ही रह सकती हैं। कारण यही है कि सप्लाई लाइन मजबूत है। जब तक यह स्टॉक खप नहीं जाता और डिमांड सामान्य नहीं होती, तब तक दामों में तेजी आने की संभावना कम है। हां, पॉपलर जैसी लकड़ी हमेशा मांग में रहती है। लेकिन कोई भी व्यापारी सौ प्रतिशत भरोसे से नहीं कह सकता कि कब और कितना बदलाव होगा। हां, यूक्लिप्टस की मांग अन्य क्षेत्रों में होने की वजह से इसकी मांग और कीमतों में कोई सुधार होने की संभावना कम ही है।

क्या जीएसटी दरों का भी कोई असर पड़ा है?

सीधे तौर पर नहीं। जीएसटी की दर अभी भी 18 प्रतिशत ही है। इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ। हां, सरकार ने कुछ अन्य क्षेत्रों में जीएसटी रेट घटाए थे तो उसका असर बाजार की मनोवृत्ति पर जरूर सकारात्मक पड़ा। क्योंकि सभी को उम्मीद है कि इससे बाजार में तेजी आएगी और सभी वस्तुओं की मांग बढ़ेगी। लेकिन लकड़ी की कीमतों में असर की असली वजह यह नहीं है। असली कारण सप्लाई और डिमांड का संतुलन है। वास्तव में इसका जीएसटी से सीधा कनेक्शन नहीं है।

अंतरराष्ट्रीय हालात, खासकर अमेरिका की पॉलिसी का कोई असर दिखा?

हां, असर तो है। जब अमेरिका जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था में झटका लगता है, तो दुनिया भर में उसका असर नजर आता है। अमेरिका में नौकरियां कम होने लगीं और आर्थिक मंदी का खतरा दिखा। ऐसे में भारत सरकार के सामने घरेलू मांग को मजबूत करने की चुनौती थी। यही वजह है कि सरकार ने डोमेस्टिक डिमांड बढ़ाने के लिए कदम उठाए।भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी आबादी है। 140-145 करोड़ की आबादी का मतलब है कि यहां डिमांड का बेस हमेशा मौजूद है।

उत्पादन को लेकर अब आपकी रणनीति क्या ?

इंडस्ट्री में नई फैक्ट्रियां तो अब 15 डेजाइट 20 डेलाइट जैसी अत्याधुनिक मशीनों के साथ काम कर रही हैं। उनका लेआउट नया है, तकनीक बेहतर है। ऐसे में उनकी प्रोडक्शन क्षमता हमसे आगे हैं, जिससे उनके ओवरहोड कम हो जाते हैं। हमारा प्लांट अपेक्षाकृत पुराना हो गया है। मैं मानता हूं कि हमें अपने हालात और खर्च के हिसाब से ही काम करना चाहिए। अगर मेरे संसाधन सीमित हैं तो मैं उतना ही उत्पादन करूंगा, जितना संभाल सकूं। जिस तरह से मांग आती है, बाजार का रूख देख कर ही उत्पादन की रणनीति बना ली जाती है।

LRB GIF

जीएसटी सुधारों पर आपकी राय

सच कहूं तो बहुत बड़ा बदलाव नहीं हुआ। जीएसटी दर घटाने की चर्चा जरूर हो रही है, लेकिन असली सुधार तभी होते हैं जब सिस्टम आसान हो। अभी व्यापारी कागजी कार्रवाई में उलझे रहते हैं। नए रजिस्ट्रेशन जैसी कुछ सुविधाएं आसान हुई हैं, लेकिन रोज़मर्रा के बिजनेस में बहुत ज्यादा फर्क नहीं आया। जीएसटी में असली सुधार तभी कहे जाएंगे, जब पेपरवर्क कम हो और व्यापारी का समय बचे। फिलहाल सरकार कानून बनाने पर तो ध्यान देती है, लेकिन उनकी सही इंप्लीमेंटेशन पर अपेक्षाकृत कम काम हो रहा है।

प्रदूषण नियंत्रण की सख्ती पर आपकी क्या राय है?

यह तो सच है कि प्रदूषण नियंत्रण के नियम सब पर लागू होते हैं। अगर सिर्फ कुछ लोगों पर लागू होते तो विरोध और विवाद ज्यादा होता। लेकिन जब सब पर बराबर असर पड़ता है, तो धीरे-धीरे समाधान भी निकल आता है। समस्या यह है कि सरकार नियम तो बना देती है, लेकिन अमल करवाने में ढिलाई बरतती है। घोषणा तो कर दी जाती है, फिर छोड़ दिया जाता है। व्यापारी खुद समझते रह जाते हैं कि असल में करना क्या है? यह स्थिति बहुत ही पेचिदा वाली होती है।

बीआईएस लाइसेंस को लेकर इंडस्ट्री में क्या स्थिति है?

जिनके पास पहले से लाइसेंस है, उन्हें कोई दिक्कत नहीं है। उनका काम पहले भी चलता था और अब भी चलता रहेगा। फर्क इतना है कि खर्चा बढ़ गया है। असल समस्या उन लोगों की है जो बिना लाइसेंस काम कर रहे हैं। सरकार अभी उन पर ज्यादा सख्ती नहीं कर रही। मीटिंग में भी यही कहा गया कि एसोसिएशन सरकार को लिस्ट दे कि किसके पास लाइसेंस नहीं है। लेकिन यह व्यापारी का काम नहीं है। सरकार को खुद निरीक्षण करना चाहिए।

क्या F10 से F50 तक सभी के लिए अलग-अलग लायसेंस लेना पडेगा?

नहीं, लायसेंस तो एक ही लेना पड़ेगा। फैक्ट्री सैंपल सभी ग्रेड के अलग-अलग देने पड़ेगे। कुल मिलाकर फैक्ट्री और मार्केट सैंपल की संख्या जितनी बढ़ गई है, उससे लायसेंस धारकों की मानसिक और आर्थिक परेशानियां काफी अधिक बढ़ गई हैं।

हाल ही में कुछ फैक्ट्रियों में आग की घटनाएं हुईं हैं।

जी हां, तीन फैक्ट्रियों में, शायद तेल वाले बॉयलर के आस-पास आग लगी। मेरी जानकारी के अनुसार यह सभी हादसे एक जैसे थे। प्लाइवुड फैक्ट्री में आग लगने का मतलब है लाखों का नुकसान। अनुमान है कि प्रत्येक को 60-70 लाख रुपये तक का नुकसान हुआ। समस्या यह भी है कि इंश्योरेंस से पूरी भरपाई नहीं होती। अगर आपने पूरी इंश्योरेंस कराई है तो 70-80 प्रतिशत तक रिकवरी संभव है। लेकिन डॉक्यूमेंटेशन इतना मुश्किल है कि व्यापारी कई बार परेशान हो जाता है। 

आपके हिसाब से अब इंडस्ट्री की सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं?

  • सबसे पहले तो तकनीकी अंतर है। नई फैक्ट्रियां आधुनिक मशीनों से लैस हैं, जबकि पुराने प्लांट पिछड़ रहे हैं।
  • दूसरा, नियम-कानून। सरकार लगातार नए नियम बना रही है लेकिन उनके क्रियान्वयन की दिशा स्पष्ट नहीं है।
  • तीसरा, लाइसेंस और उनका इंप्लीमेंटेशन। बिना लाइसेंस वाले लोग भी उत्पादन कर रहे हैं और सरकार उन पर सख्ती नहीं करती।
  • और चौथा, बाजार में अनिश्चितता। कच्चे और तैयार माल की कीमतें कभी ऊपर तो कभी नीचे कृकिसी व्यापारी के लिए स्थिरता नहीं है।

 👇 Please Note 👇

Thank you for reading our article!

If you don’t received industries updates, News & our daily articles

please Whatsapp your Wapp No. or V Card on 8278298590, your number will be added in our broadcasting list.


Natural Natural