गुणवत्ता की संस्कृति तभी विकसित हो सकती है जब अच्छी गुणवत्ता को न केवल पहचाना जाए, बल्कि उसे खुले तौर पर सराहा और पुरस्कृत भी किया जाए। इसके साथ-साथ, घटिया गुणवत्ता को बिना किसी झिझक के अस्वीकार करना भी उतना ही आवश्यक है।

गुणवत्ता का अर्थ केवल मानक पूरा करना नहीं, बल्कि अपेक्षाओं से बेहतर प्रदर्शन करना होता है। इसके लिए उपभोक्ताओं, संस्थानों और नीति-निर्माताओंकृतीनों की सक्रिय भूमिका आवश्यक है। उपभोक्ताओं को अच्छे उत्पादों और सेवाओं के प्रति निष्ठा दिखानी चाहिए और मूल्य-प्रीमियम देकर उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए, जबकि खराब गुणवत्ता को स्पष्ट रूप से खारिज किया जाना चाहिए।

दुर्भाग्य से, हमारे समाज में आज ऐसी मानसिकता कमजोर पड़ चुकी है। हमारे पास “अस्वीकृति की स्पष्ट सीमा” नहीं है। हम खराब परिणामों को भी सहजता से स्वीकार कर लेते हैंकृचाहे वे सेवाओं में हों, उत्पादों में हों या सार्वजनिक व्यवस्थाओं में। व्यक्तिगत स्तर पर भी हम अपनी गलतियों, अधूरे काम और औसत प्रदर्शन को सामान्य मान लेते हैं।

हम खराब आधारभूत ढांचे को भी सामान्य मान लेते हैंकृगड्ढों से भरी सड़कें, बारिश में जलभराव, जगह-जगह कचरे के ढेर। अस्पतालों में बुनियादी स्वच्छता की कमी, प्रयोगशालाओं और टेस्ट सेंटरों में नमूनों व लेबलों की गड़बड़ी, बाजार में मिलावट और नकली उत्पादों की भरमार, सरकारी दफ्तरों में सुविधा शुल्क देना, और यातायात नियमों का खुलेआम उल्लंघनकृये सभी ऐसे उदाहरण हैं जिन्हें समाज को सख्ती से अस्वीकार करना चाहिए था। लेकिन समय के साथ ये समस्याएँ हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गई हैं।

मानकों के प्रति यह उदासीनता और अक्षमता को सामान्य मान लेने के पीछे कई कारण हैं। एक बड़ा कारण विकासशील अर्थव्यवस्था पर कम कीमत में सेवाएँ और उत्पाद उपलब्ध कराने का दबाव है।

इसी दबाव के चलते “कम कीमत में उच्च गुणवत्ता” जैसे विरोधाभासी वाक्य लोकप्रिय हो गए हैं। उद्योग जगत में इसे अक्सर दक्षता और नवाचार की उपलब्धि के रूप में देखा जाता है, जबकि वास्तव में यह उच्च गुणवत्ता के मूल विचार के साथ समझौता है। उच्च गुणवत्ता और अत्यधिक कम कीमतकृदोनों लक्ष्य अक्सर एक-दूसरे के विपरीत दिशा में काम करते हैं, और इस सच्चाई को नज़रअंदाज़ करना दीर्घकाल में नुकसानदेह होता है।

वास्तव में एक विकसित भारत के लिए मानसिकता में गहरा और व्यापक परिवर्तन अनिवार्य है। गुणवत्ता के प्रति सम्मान केवल नियमों और प्रमाणपत्रों से नहीं आता, बल्कि सामाजिक व्यवहार और सामूहिक अपेक्षाओं से बनता है। जब तक नागरिक, उपभोक्ता और संस्थाएँ मिलकर खराब गुणवत्ता को अस्वीकार नहीं करेंगे, तब तक कोई भी सुधार स्थायी नहीं होगा। यह बदलाव आसान नहीं है। इसके लिए स्पष्ट सोच, निरंतर फोकस, जवाबदेही और मजबूत नेतृत्व की आवश्यकता होगी।

इतिहास बताता है कि सामाजिक मानक बदले जा सकते हैं। एक समय था जब रेस्तरां में सर्वर एक ही हाथ में कई गिलास उठाकर लाते थे और उनकी उंगलियाँ गिलासों के भीतर होती थींकृऔर ग्राहक इसे सामान्य मान लेते थे। आज यह व्यवहार किसी भी मानक पर स्वीकार्य नहीं है। यह परिवर्तन रातों-रात नहीं हुआ, बल्कि जागरूकता, नियमों और उपभोक्ताओं की अस्वीकृति के कारण संभव हुआ। यही सिद्धांत अन्य क्षेत्रों में भी लागू किया जा सकता है।

आज आवश्यकता है कि भारत अपनी “अस्वीकृति की सीमा” को तेजी से ऊपर उठाए। खराब गुणवत्ता को सहन करना बंद करना होगाकृचाहे वह सार्वजनिक सेवाओं में हो, निजी क्षेत्र में हो या व्यक्तिगत कामकाज में। जब घटिया गुणवत्ता सामाजिक, आर्थिक और नैतिक रूप से अस्वीकार्य बन जाएगी, तभी उत्कृष्टता की सच्ची संस्कृति विकसित होगी।

गुणवत्ता केवल नीतियों, कानूनों या मानकों से नहीं सुधरतीकृयह तब सुधरती है जब समाज सामूहिक रूप से यह तय कर ले कि औसत या खराब अब स्वीकार्य नहीं है। यही मानसिकता भारत को वास्तव में विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में मजबूत आधार प्रदान करेगी।

 

सुरेश बाहेती 

9050800888


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