The new reality of America and India’s capability of absorbing shocks

अमेरिका कर से जितना कमा रहा है उससे ज्यादा खर्च कर रहा है और कमी की भरपाई सरकारी बॉन्ड या ट्रेजरी, बॉन्ड के जरिये रकम जुटाकर कर रहा है। यह भी पता चला है कि पिछले कुछ दशकों में उसने बॉन्ड से इतनी रकम जुटाई है कि 2025 के आरंभ में सरकार पर 34 लाख करोड़ डॉलर से ज्यादा कर्ज हो चुका है।

अमेरिका में गुगल (अल्फाबेट), माइक्रोसॉफ्ट, एमेजॉन, ओपनएआई (चौटजीपीटी), मेटा और ऐपल जैसी बडी निजी तकनीकी कंपनियां हैं. जिनका पूरी दुनिया में दबदबा है। मगर वह देश गले तक कर्ज में डूबा है।

आम तौर पर जवाब यही होता है कि ये निजी कंपनियां है, सरकार नहीं और उनका मुनाफा शेयरधारकों संस्थापकों तथा अधिकारियों के बीच बंट जाता है। अमेरिका सरकार को इस मुनाफे में से कुछ भी बतौर कर नहीं मिलता है।

अमेरिका में ऐसे ही घाटा चलता रहा तो पूरी दुनिया में हाहाकार मच जाएगा अमेरिका और मुद्रा बाजार बदहवास हो जाएगा। इससे आपूर्ति श्रृंखला भी बिगड़ सकती है, जिससे अमेरिका में मांग खत्म हो जाएगी और पूरी दुनिया खास तौर पर एशिया से निर्यात घट जाएगा।

इसके मायने ये भी हैं कि तकनीकी ऑर्डर, सेवाओं की आउटसोर्सिग और कच्चे माल के आयात पर चोट पड़ेगी, जिससे भारत भी प्रभावित होगा। क्योंकि अमेरिका से आईटी आउटसोर्सिंग के जरिये होने वाली कमाई एकदम कम हो जाएगी।

नई दुनिया में अमेरिका जैसे पश्चिमी बाजार लगातार संरक्षणवादी होते जाएंगे। ट्रंप के सारे बड़े काम संरक्षणवाद से जुड़े हैं चाहे अमेरिका आने वाले माल पर आयात शुल्क बढ़ाना हो या अमेरिका से जाने वाले माल पर दूसरे देशों से आयात शुल्क घटाने की मांग करना हो।

क्या भारत को रचनात्मक देश बनना चाहिए? जो बड़े-बड़े उद्योगों का सपना न देखे बल्कि नीचे से ऊपर तक झटके झेलने के लायक बने। क्योंकि बड़े उद्योग दुनिया में हो रहे बदलाव की चपेट में आ जाते हैं।

भारत को सेवा के मामले में अपनी बढ़त, डिजिटल महारत और कर्मचारियों की भारी तादाद पर ध्यांन लगाना चाहिए क्योंकि डॉलर का दबदबा या अमेरिका का एकाधिकार खत्म होने के बाद दुनिया में सबसे कीमती संपत्ति ये ही होंगी।

तो क्या भारत की आर्थिक रणनीतियों पर फिर सोचने और आने वाली नई दुनिया के लिए कमर कसने का वक्त आ गया है?


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