बदलाव का दौर है, इस पर नजर रखें, कुछ स्पष्ट हो तभी निर्णय लें
- मई 8, 2025
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एक तरफ लकड़ी के दाम बढ़ रहे हैं। उपर से बीआईएस के मानक अनिवार्य हो गए हैं। यानी चुनौतियां दुगुनी सी हो गई।
कुल मिला कर हम कह सकते हैं कि यह बदलाव का दौर है। कुछ समय इस तरह की परिस्थितियां बनी रहेगी। जो व्यापार मे अनिश्चितता की स्थिति बना रही है। इसलिए कोई भी महत्वपूर्ण निवेश संबंधित निर्णय लेने से पहले थोड़ा धीरज रखते हुए परिस्थितियों का विश्लेषण करना चाहिए। स्थिति कुछ स्पष्ट हो, तभी निर्णय लिया जाए तो बेहतर रह सकता है।
यह मानना है गैबॉन अफ्रीका में वीनियर निर्माता आलोक अग्रवाल का। अलोक अग्रवाल इससे पहले गांधी धाम में प्लाईवुड निर्माता रहे हैं। अब वह अफ्रीका में काम कर रहे हैं।
गैबॉन में कामकाजी परिस्थितियां
जब हमने गैबॉन में निवेश किया था, तब मुनाफा अच्छा था, लेकिन समय के साथ अब यहां भी यूनिटों की संख्या बढ़ रही है। इसलिए मुनाफा उतना नहीं रहा। कई बार परिस्थितियां तनावपूर्ण भी हो जाती है। यहां भी कई यूनिट बंद हो रही है।
विदेश में यूनिट चलाना आसान भी नहीं है। वह भी सैनिक शासन मे। एक तो यहां नियम कड़े हैं, दूसरा उनका पालन भी हर हालत में करना होता है। इसलिए एक तरह का मानसिक दबाव भी बना रहता है।
दूसरा स्थानीय सरकार कब क्या नीति बदल दें, यह भी चिंता लगी रहती है।
हम यह कह सकते हैं भारत से भी ज्यादा समस्या इस वक्त गैबॉन में हैं। लकड़ी की उपलब्धता से प्रेरित होकर उद्योगपति अफ्रीका जैसे देशों में स्थापित हुए थे। लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं कि इससे सारी समस्या खत्म हो जाती है। अंतर यह है कि समस्या अब दूसरी तरह की हो गई हैं।
गांधीधाम में कामकाजी परिस्थितियां
इसी तरह से यमुनानगर और नार्थ के उद्योगपति अब गांधीधाम में यूनिट स्थापित कर रहे हैं। उत्तर भारत में लकड़ी के दाम बहुत ज्यादा बढ़ गए हैं। गांधीधाम में माल तैयार करना अपेक्षाकृत सस्ता पड़ता है। यहां आयात होने वाला कच्चा माल लकड़ी या कोर अपेक्षाकृत सस्ता पड़ता है। लेकिन यहां भी अलग तरह की समस्या है।
एक तो यहां काम करने का तरीका ही अलग है। गांधीधाम में दक्ष कर्मचारियों का अभाव हैं। गांधीधाम में दिक्कत यह भी है कि यहां गर्मी ज्यादा है। इसका असर श्रमिकों की उत्पादकता पर भी पड़ता है। अब यमुनानगर और बाहर से जो उद्योगपति यहां आ रहे हैं, ऐसा हो सकता है वह यहां काम के माहौल को थोड़ा बदल दें।
गांधीधाम में भी ज्यादातर फैक्टरी किसी तरह से खुद को बनाए हुए हैं, 25 प्रतिशत उद्योग ही मुनाफा कमाने की स्थिति में हैं। यहां बोर्ड व दरवाजे बनाने वाले तो अपेक्षाकृत अधिक सफल है, लेकिन प्लाईवुड में सफलता का अनुपात अपेक्षाकृत कम है।
गांधीधाम के उत्पादक न तो ब्रांड बन पाए, न ही नीचे की श्रेणी में रहे। यहां के उद्योगपतियों को इस ओर भी ध्यान देना होगा।
गांधीधाम में लकड़ी और कोर का आयात
अब गांधीधाम में पाइन और यूक्ल्पिटस की कोर का बहुतायत से इस्तेमाल होता है। कुछ सिर्फ पाइन और कुछ सिर्फ सफेदा का इस्तेमाल करते हैं। ब्राजील, साऊथ अफ्रिका, उरूग्वे, अर्जेंटिना से पहले लकड़ी आयात होती थी। अब दो तीन माह से यहां तंजानिया से कोर आ रही है, इससे स्थिति में कुछ सुधार होता नजर आ रहा है, लेकिन एक संशय बना रहता है। पता नहीं कब वहां की सरकार अपनी पॉलिसी बदल दें, जिससे आयात फिर से बंद हो जाए।
छह माह पहले तक बंद ही था। इसलिए भविष्य में भी इस तरह की आशंका बनी रहती है। आयात पर निर्भर नहीं रह सकते, क्योंकि पता नहीं कब कहां की सरकार की पॉलिसी में क्या बदलाव आ जाए।
पाइन की कोर नहीं बल्कि पाइन लकड़ी, न्यूजीलैंड और आस्टेªलिया से आ रही है, जिसे गांधीधाम में पील किया जाता है। उत्तर भारत में इसकी अच्छी मांग है। बल्कि कई उत्तर भारतीय उद्योगपतियों ने यहां अपनी पीलींग मशीनें भी लगा ली हैं

कोर और लकड़ी के आयात में चुनौतियां
भारत में जो भी माल आयात होता है, उसकी बिलिंग पूरी होती है। इस माल का भुगतान भी पहले करना होता है। इसके लिए नकद मे भुगतान करना होता है या फिर एलसी होनी चाहिए।
उत्तर भारत के निर्माताओं में ज्यादातर के पास या तो एलसी नहीं होती या एलसी पर काम करना नही चाहते।
चाइना से प्लाईवुड तो अंडर बिलिंग में आ जाता था, लेकिन कच्चा माल पूरे बिल पर ही आता है। यूं भी लकड़ी के अंतरराष्ट्रीय स्तर के सप्लायर हैं, पूरे बिल पर ही माल बेचते हैं।
चीन में क्योंकि निर्यात पर उन्हें छूट भी मिलती है। इसलिए भी वह अंडर बिल नहीं दिखाते। एक वजह यह भी है कि चीन के निर्यातकों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि भुगतान का तरीका क्या है।
अपने प्लांट को दूसरे राज्य मे स्थानांतरित करना
जो उद्योगपति जहां सालों से काम कर रहा है, वह वहां के तौर तरीके से वाकिफ हो चुका होता है। नई जगह में नई तरह की चुनौतियां होंगी। कुछ काम को आसान बनाएगे तो कुछ मुश्किलें पैदा करेंगी। इसलिए किसी भी उद्योगपति को चाहिए कि वह अपने चले चलाए यूनिट को दूसरी जगह शिफ्ट करने से बचे। क्योंकि शिफ्टिंग पर ही एक से दो करोड़ रूपए खर्चा आ सकता है।
उद्योगों को प्रोत्साहन देने की राज्य सरकारों की कोशिश कई जगह कामयाब है, जिसमें कई तरह की छूट मिल जाती है। जिससे रोजमर्रा के कामकाज में कुछ अतिरिक्त आमदनी दिखती हैं। यह नए उद्योग के लिए तो ठीक है। क्योंकि इस तरह की छूट से उन्हें शुरूआती लाभ मिल जाता है। इससे काम करना आसान हो सकता है।
QCO लागू हाने के बाद की परिस्थितियां
जहां तक बीआईएस मानकों की बात है, भारतीय उद्योगपतियों के लिए तो यह एक मौका है। क्योंकि अभी वियतनाम व चाइना जैसे प्लाईउड उत्पादक भारतीय मानकों पर खरा नहीं उतर सकते हैं। इसकी वजह यह है कि वियतनाम की फैक्ट्रियों में ड्रायर ही नहीं है। उनकी यूनिट को तो BIS लाइसेंस ही मुश्किल से मिलेगा। पहले जो फ्लो में वियतनाम से माल आ रहा था, वह बंद हो सकता है।
चीन में गैस से चलने वाली ड्रायर की कुछ फैक्ट्रियां है। इसलिए चीन से भी अभी कोई चुनौती नहीं है। नेपाल की ज्यादातर यूनिट भारतीय मानकों पर खरा उतर सकती है। क्योंकि इसमें ज्यादातर तो भारतीय प्रवासी हैं। फिर भी बड़ी चुनौती यह है कि भारतीय प्लाइवुड निर्माता बीआईएस लेने के लिए आगे नहीं आ रहे हैं। इस मानसिकता को बदलना चाहिए।
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