भारत के नियामकीय ढांचे में 1,563 कानून हैं और इनके अंतर्गत 69,233 शर्तों का पालन करना पड़ता है। इनमें नई शर्ते जुड़ती रहती हैं।

पिछले कुछ वर्षों में 3,400 प्रावधान गैर-आपराधिक हो गए और 39,000 से अधिक अनुपालनों की जरूरत खत्म कर दी गई।

ये बदलाव प्रगतिवादी लग रह रहे हैं मगर कुछ समस्याएं अभी बनी हुई हैं, जिनके लिए मौजूदा सुधार जारी रखने तथा कानूनी स्तर पर उपाए करने की जरूरत है।

नागरिकों के साथ आपसी विश्वास को बढ़ावा देने की तुलना में कारोबार के साथ विश्वास बहाल करना अधिक मुश्किल काम है। भ्रष्टाचार होने की आशंका से विश्वास बहाली और मुश्किल होती जाती है।

एक कारण यह भी है कि कारोबार में कई पक्ष शामिल होते हैं जिनकी आवश्यकताएं अलग-अलग होती हैं। इससे समान स्तर पर विश्वास बहाल करना और मुश्किल हो जाता है।

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हालांकि, कुछ नियामकीय शर्तें समाज कल्याण के लिए जरूरी होती हैं और इस परिप्रेक्ष्य में महत्त्वपूर्ण और कुछ कम जरूरी शर्तों के बीच अंतर करने की जरूरत महसूस होने लगी है।

सरकार और कारोबार के बीच अविश्वास दूर करने के लिए पारदर्शिता बुनियादी शर्त है। डिजिटल लेन-देन से ऑडिट आसान हो रहा है जिससे अनैतिक व्यवहारों पर रोक लगती है और कदाचार तुरंत पकड़ में आता है। इससे लंबी नियामकीय प्रक्रिया की जरूरत कम हो जाती है।

यह समीक्षा जरूरी और गैर-जरूरी आवश्यकताओं में अंतर की पहचान करने, स्व-अभिप्रमाणन को बढ़ावा देने, प्रक्रिया सरल करने और डिजिटलीकरण का लाभ उठाने पर केंद्रित होनी चाहिए। निरीक्षण और तीसरे पक्ष से प्रमाणन (थर्ड पार्टी सर्टिफिकेशन) की शर्त, जहां भी संभव हो, समाप्त की जानी चाहिए। गैर-जरूरी और अस्पष्ट शर्तें दूर की जानी चाहिए और जो सूचनाएं पहले से सरकारी एजेंसियों के पास मौजूद हैं वे दोबारा नहीं मांगी जानी चाहिए। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की मदद से ऑनलाइन सुविधा शुरू करने से कारोबार समुदाय स्वयं जरूरी शर्तों का अनुपालन कर सकते है।

भारत ने विश्वास आधारित सरकारी तंत्र तैयार करने में काफी प्रगति की है, विशेषकर नागरिकों के साथ विश्वास बहाली की प्रक्रिया मजबूत हुई है। लेकिन अभी भी बहुत कुछ करना शेष है।


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