एक समय था जब सरकार पेट्रोलियम की कीमतों पर नियंत्रण रखती थी और उनकी कीमतों में बदलाव सरकारें अपनी सुविधानुसार राजनैतिक लाभ लेने के लिए करती थी। हालांकि जब एकाएक झटके से कीमत बहुत बढ़ानी पड़ जाती, तो यह अर्थव्यवस्था के लिए सदमे की तरह होता।

सरकार ने इन अनुभवों से सबक लिया कि कीमतों में बार-बार छोटा-छोटा बदलाव करना ज्यादा अच्छा और सार्थक होता है।

यही बात डालर-रूपये की विनिमय दर पर भी लागू होती है। विनिमय दर को कुछ समय तक थामे रखना संभव है। परंतु मुक्त बाजार में उसकी कीमत और सरकार द्वारा तय कीमत में अंतर आने लगता है। इससे आर्थिक गड़बड़ी शुरू होती है और जब विनिमय दर में एकाएक बड़ा बदलाव होता है, तो यह स्थिती, मुक्त बाजार की विनिमय दर में रोज होने वाले, छोटे छोटे बदलाव से ज्यादा उथल-पुथल पैदा कर देता है।

हर कंपनी को अपना व्यापार करते हुए कच्चे और तैयार माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव झेलना पड़ता है। कारोबार का अर्थ भी यही है कि आर्थिक मोर्चे पर लगातार बदलती दुनिया में धन कैसे कमाया जा सकता है।

बिडंबना यही है कि, अधिकतर कंपनियां आसान रास्ता ढूंढती हैं। वे चाहती हैं कि सरकार उन्हें एक स्थिर माहौल दे, जहां स्टील, सीमेंट, पेट्रोल, डॉलर-रुपये आदि की कीमतें एक जगह टिकी रहें।

आम समझ यही है कि सरकार के इस सहयोग से कंपनियां उत्पादन और निर्यात करना सीखेंगी और अपने आप को स्थिर एवं मजबूत बना लेंगी। मगर स्थिरता के लंबे दौर के कारण अमूमन कंपनियां लापरवाह हो जाती हैं और अपनी आवष्यक मजबूत सांगठनिक क्षमता तैयार नहीं कर पाती हैं।

Vibrant Buildcon

भारतीय आर्थिक वृद्धि के नजरिये से सक्षम एवं मजबूत कंपनियों के उभरने और बढ़ने से ही आर्थिक विकास होगा।

हालांकि निर्यात आखिरी मंजिल नहीं है। ऊंची उत्पादकता वाली सक्षम कंपनियां ही आखिरी मंजिल हैं। निर्यात की ताकत वह पैमाना है, जिस पर हम कंपनियों की क्षमता नाप पाते हैं।

जब कंपनियां निर्यात के लिए बिना किसी सहारे के जूझती हैं, तो वे उत्पादकता हासिल कर ही लेती हैं। ऊंची उत्पादकता वाली कंपनियां, कीमतों में उतार-चढ़ाव को सहने और उससे निपटने के लिए, जरूरी सांगठनिक क्षमता तैयार कर अपने आपको सक्षम और मजबूत कर लेती हैं। मगर सांगठनिक क्षमता आनन-फानन में तैयार नहीं होती। एक लक्ष्य तय कर कई साल तक कोशिश करनी पड़ती है, तब जाकर उच्च संस्थागत क्षमता तैयार होती है।

जिन कमजोर और व्यवस्थाहीन कंपनियों को, कीमतों के उतार-चढ़ाव को ना झेल पाने से खुद ही बंद हो जाना चाहिए था, वे भी किसी तरह बनी रहती हैं और उन संसाधनों पर कब्जा रखती हैं, जिन्हें उच्च उत्पादकता के समर्थन के लिए मुक्त हो जाना चाहिए था।

भारत सरकार, QCO के माध्यम से, आयात में प्रतिबन्ध लगाकर, प्लाईवुड और पेनल उद्योग को, जो सहयोग कर रही है, उसको भुनाने का, यही समय सबसे उत्तम समय है।

वैश्विक राजनैतिक और आर्थिक परिस्थितियों के साथ घरेलु माहौल का आंकलन करना भी एक दुष्कर कार्य है।

अतः वर्तमान सकारात्मक समय का सदुपयोग करते हुए, हम अपने आपके लिए उच्च लक्ष्य निर्धारित करें और उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए, अपने सारे संसाधनों का उपयोग करते हुए, पूर्ण मनोयोग से परिश्रम करें, यही सभी के लिए अपेक्षित है।

 

सुरेश बाहेती 

9050800888


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