क्या मध्यवर्ग को आयकर राहत से अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटेगी?
- मार्च 10, 2025
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यह संभव नहीं है कि एक ही साथ कर भी घटा दिए जाएं और ऋण तथा राजकोषीय घाटा भी कम कर दिया जाए, वहीं वृद्धि को बढ़ावा देने वाले क्षेत्रों एवं बुनियादी ढ़ांचे में निवेश भी कर दिया जाए। मगर वित्त मंत्री ने 2025-26 के केंद्रीय बजट में यह सब साधने की कोशिश की है।
बजट में बहुत चतुराई के साथ बताया गया है कि वृद्धि के लिए पूंजीगत व्यय को लगातार बढ़ाते रहना जरूरी नहीं है और ‘मध्य वर्ग‘ से मांग वापस आने पर भी ऐसा हो सकता है।
लेकिन भारत में मध्यवर्ग की संख्या कितनी है? प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने हाल ही में भारत मोबिलिटी प्रर्दशनी को संबोधित करते हुए कहा कि उन्होंने लगभग 25 करोड़ लोगों के लिए बाजार खोल दिया है। इन लोगों को वह ‘नव मध्य वर्ग‘ कहते हैं। भारत के असली मध्य वर्ग का यह शायद सही आकलन है।
पुराना मध्य वर्ग वह था, जो तीन दशक पहले एक वाहन खरीद सकता था और अब वह वर्ग शायद अमीर हो चुका है। तब क्या हम कह सकते हैं कि भारत में अब हर कोई अब मध्य वर्ग मे आ गया है ? बिल्कुल नहीं।
यह पक्की बात है कि 80 करोड़ से अधिक लोग यानी भारत की लगभग 60 फीसदी आबादी प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत मुफ्त अनाज लेती हैं। इस 60 फिसदी आबादी को मध्य वर्ग मानना मुश्किल है, इसलिए देश में ज्यादा से ज्यादा 40 फीसदी आबादी मध्य वर्ग की है, जिसमे 60 करोड़ लोग यानी 12 करोड़ से कम परिवार हैं।
पिछले साल आयकर रिटर्न दाखिल करने की तय तारीक तक 7.5 करोड़ रिटर्न भरे गए, जिनमें से लगभग 4.8 करोड़ पर कोई कर ही नहीं बना था। यानी लगभग 2.8 करोड़ लोगों पर ही इस आयकर छूट का असर पड़ेगा। तो क्या प्रत्यक्ष कर देने वाले 3 करोड़ लोग ही मध्य वर्ग है?
या मध्य वर्ग वे 12 करोड़ परिवार हैं, जो अनाज के लिए सरकार पर निर्भर नहीं हैं? क्या 3 करोड़ लोगों को मध्य वर्ग मान सकते हैं चाहे वे देश की 140 करोड़ की आबादी में सबसे ज्यादा अमीर हों? ऐसे तो ‘मिडल‘ की परिभाषा और दायरा कुछ ज्यादा ही बड़ा हो जाएगा।
मंदी से बाहर निकलने के लिए किसी काल्पनिक मध्य वर्ग पर निर्भर हो जाने से पहले हमें इस सवाल का सही जवाब पाना होगा। फिर भी हमें ऐसे बजट की सराहना करनी चाहिए, जिसमें नियमन घटाने, आर्थिक उदारता लाने का संकेत है और प्रत्यक्ष करों में सुधार का वादा है।
इस बजट में खुश होने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन हमें भावनाओं में बह नहीं जाना चाहिए और यह नहीं मान लेना चाहिए कि ‘मध्य वर्ग‘ के लिए कटौती से या हमें जो मिला है, उससे अर्थव्यवस्था की वृद्धि की रफ्तार पटरी पर जल्दी ही आ जाएगी।
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