भारतीय प्लाईवुड और पैनल उद्योग महासंघ ने चिंता जाहिर की है कि नेपाल में बीआईएस लाइसेंस का दुरुपयोग हो रहा है। महासंघ के महानिदेशक डा. एमपी सिंह ने पत्र के माध्यम से भारत सरकार से मांग की कि इसकी जांच की जाए।

भारत में 28 फरवरी 2025 से “प्लाईवुड और वुडन फ्लश डोर शटर (गुणवत्ता नियंत्रण) आदेश, 2024” और 11 फरवरी 2025 से “वुड बेस्ड बोर्ड (गुणवत्ता नियंत्रण) आदेश, 2024” लागू किए गए हैं। इसके तहत विदेशी प्लाईवुड उत्पादकों के लिए, भारत में माल निर्यात करने के लिए, बीआईएस लाइसेंस अनिवार्य कर दिया गया है।

वित्त वर्ष 2024-25 में भारत के कुल प्लाईवुड आयात में से लगभग 21 प्रतिशत (करीब ₹514 करोड़) नेपाल से था। क्यूसीओ लागू होने के बाद, नेपाल के केवल 9 उत्पादकों को अब तक बीआईएस लाइसेंस जारी हुए हैं।

फिप्पी द्वारा किए गए सर्वेक्षण में कुछ चौंकाने वाले आंकडे सामने आए। रिपोर्ट के अनुसार कुल 9 लायसेंसधारी उत्पादकों ने जनवरी से अप्रैल 2025 तक 807 कंटेनर का निर्यात किया। लेकिन सिर्फ मई के एक महीने में ही 1211 कंटेनर का निर्यात कर दिया गया। इसे इस तालिका में और स्पश्ट किया गया हैः-

अब सवाल यह है कि जब नेपाल में केवल 54 में से 9 निर्माताओं को बीआईएस लाइसेंस मिला है, तो मई 2025 में प्लाईवुड का आयात इतनी तेज़ी से कैसे बढ़ गया?

इससे सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि नेपाल में बीआईएस लाइसेंस का दुरुपयोग हो रहा है। लाइसेंसधारी निर्माता, गैर-लाइसेंसधारी माल को अपने नाम पर भारत में भेज रहे हैं, जिससे क्यूसीओ का उद्देश्य विफल हो रहा है और देश की घरेलू कंपनियां नुकसान में हैं।

फिप्पी के अनुसार भारत में बीआईएस इसलिए लागू किया गया था, ताकि देश में उच्च गुणवत्ता के लकड़ी के उत्पाद उपलब्ध हो। लेकिन नेपाल से जिस तरह से इस लाइसेंस की आड़ में कम गुणवत्ता का माल भारतीय बाजार में भेजा रहा है, यह बहुत ही चिंता का विषय है। इससे जहां सरकार के प्रयास को धक्का लग रहा है, वहीं बाजार में कम गुणवत्ता का सस्ता माल अनैतिक रूप से मुहैया करा कर भारतीय लकड़ी आधारित उद्योग को गहरी आर्थिक चोट पहुंचाई जा रही है।

फिप्पी के साथ साथ अन्य प्लाईवुुड उत्पादक संस्थाओं ने सरकार, विशेश रूप से बी आई एस से, मांग की है कि इस मुद्दे की तत्काल जांच की जाए। दोषी लाइसेंसधारी कंपनियों के बीआईएस लाइसेंस तुरंत रद्द किए जाएं। इसके साथ ही नेपाल से भारत में जो भी माल आ रहा है, उसकी पूरी जांच की जाए। यदि ऐसा नहीं होता तो बीआईएस लागू करने की कोशिशों को धक्का लग सकता है।