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- अक्टूबर 10, 2025
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आप प्लाईवुड और पैनल उद्योग की सबसे बड़ी समस्या, यानी कच्चे माल की किल्लत को वर्तमान परिस्थितियों में कैसे देखते हैं?
प्लाईवुड और पेनल उद्योग में कच्चे माल की समस्या कई स्तरों पर है। अभी मांग की तुलना में पेंड़ो का उत्पादन कम है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि जो भारतीय मैटीरियल उपलब्ध है, उसकी गुणवत्ता दिनों दिन कमतर होती जा रही है। पहले पेड़ की कटाई का चक्र छह साल का होता था, जो अब घटकर तीन या दो साल का हो गया है, जिससे गुणवत्ता पर सीधा असर पड़ा है।
दूसरी समस्या भौगोलिक असंतुलन की है। उदाहरण के लिए, हरियाणा में पॉपुलर (Poplar) तो मिल जाता है, लेकिन अन्य लकड़ियाँ कम हैं। वहीं दूसरे राज्यों में स्थिति इसके ठीक उलट है।
फेस विनियर (Face Veneer) की समस्या तो आज भी बहुत बड़ी है, क्योंकि उसके लिए अधिक उम्र के पेड़ की आवश्यकता होती है, जिसमें 15 से 20 साल लग जाते हैं। इतने समय के लिए तो किसान पेड़ को रखता नहीं। इन्हीं कारणों से उद्योग आयातित लकड़ी, पर बहुत अधिक निर्भर हो गया है। इसका विकल्प अभी उपलब्ध नहीं है।

दूसरी समस्या भौगोलिक असंतुलन की है। उदाहरण के लिए, हरियाणा में पॉपुलर (Poplar) तो मिल जाता है, लेकिन अन्य लकड़ियाँ कम हैं। वहीं दूसरे राज्यों में स्थिति इसके ठीक उलट है।
फेस विनियर (Face Veneer) की समस्या तो आज भी बहुत बड़ी है, क्योंकि उसके लिए अधिक उम्र के पेड़ की आवश्यकता होती है, जिसमें 15 से 20 साल लग जाते हैं। इतने समय के लिए तो किसान पेड़ को रखता नहीं। इन्हीं कारणों से उद्योग आयातित लकड़ी, पर बहुत अधिक निर्भर हो गया है। इसका विकल्प अभी उपलब्ध नहीं है।
लकड़ी के दाम अभी ज्यादा है। इस वजह से उद्योग को उत्पादन लागत ज्यादा पड़ रही है। निकट भविष्य में भी पर लकड़ी की कमी बनी रहेगी।
माना तो यह जा रहा है कि हरियाणा में पौधा रोपण काफी अच्छा हो रहा है, फिर भी यूपी से ही ज्यादा कच्चा माल आ रहा है?
हरियाणा में अभी पॉपुलर प्लांटेसन का क्षेत्रफल बढ़ रहा है। हरियाणा में प्लाईवुड इंडस्ट्री ज्यादा है। इसलिए कच्चे माल की मांग भी ज्यादा रहती है। इसलिए यूपी से लकड़ी यहां आ रही है। हालांकि यूपी से पोपुलर की बजाय यूक्लिपस की लकड़ी ज्यादा आ रही है। जो वहां का पॉपुलर है,उसकी अधिकतम खपतयूपी में ही हो जाती है।
उत्तराखंड में भी अब रुद्रपुर डेवलप हो गया है। उत्तराखंड व यूपी में पैनल इंडस्ट्री लगातार बढ़ रही है। होशियार में भी अब अपनी मंडी विकसित हो गयी। इसलिए जम्मू व श्रीनगर से आने वाला कच्चा माल पठानकोट व होशियारपुर तक ही पहुंच पाता है। इससे आगे जम्मू का कच्चा माल यदि ले जाया जाए तो इसका परिवहन खर्च भी बढ़ जाता है।
लकड़ी में लिग्निन क्या होता है?
लिग्निन लकड़ी का एक प्रमुख तत्व है। लकड़ी में दो मुख्य तत्व सेलुलोज और लिग्निन 95% होते हैं। लिग्निन को आप लकड़ी की हड्डियां मान सकते हैं। सेलुलोज को आप मसल्स कह सकते हैं। पेपर इंडस्ट्री की कोशिश रहती है कि सेलूलोज ज्यादा हो। लेकिन प्लाई उद्योग में लिगनिन की उपयोगिता अपेक्षाकृत अधिक है।
इसलिए पेपर इन्डस्ट्री की कोशिश रहती है कि किसान ऐसी लकड़ी की किस्म उगाएं, जिसमें 70% सेलुलोज हो। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि लिग्निन की उपयोगिता कम है। यह लकड़ी को मजबूती देता है। इसलिए प्लाई में लिग्निन की अपनी उपयोगिता है। इसलिए जिस लकड़ी में लिग्निन की मात्रा सही है तो इससे बनी प्लाई का Strength अच्छा रहता हैं। क्योंकि Wood में, Adhesive पद nature कह सकते हैं।
ऐसे पौधों की किस्मों पर काम करने के लिए फिप्पी से एमओयू किया, जिसमें ऐसे पौधे विकसित करने पर जोर दिया जाए,जिसमें लिग्निन की मात्रा भी बढ़े। भविष्य में इस तरह के पौधे रोपण के लिए किसानों को उपलब्ध कराए जाए,
जिसमें सेलुलोज व लिग्निनकी मात्रा अनुपातिक तरीके से सही हो। इस तथ्य को प्लाईवुड व लकड़ी उद्योग को भी समझना होगा। उन्हें भी ऐसे पौधा रोपण को बढ़ावा देना चाहिए जिसमें सेलुलोज के साथ साथ लिगनिन की मात्रा ज्यादा हो। यह प्लाई व लकड़ी उद्योग के भविष्य के लिए एक मजबूत कदम साबित हो सकता है।
इसमें किसानों की क्या भूमिका है? क्या उद्योग और किसानों के बीच कोई तालमेल की कमी है?
बिलकुल। किसान वही पेड़ लगाएगा जिसे वह अपने सबसे नजदीकी इंडस्ट्री को आसानी से बेच सके और जिससे उसे ज्यादा मुनाफा हो। इसलिए सबसे पहले तो उद्योग को यह समझ विकसित करनी होगी कि उन्हें कच्चे माल के तौर पर किस तरह की लकड़ी चाहिए। वह अपने उद्योग का भविष्य किस तरह से और किस किस्म की लकड़ी में देख रहे हैं।
किसान पौधा रोपण के लिए वही किस्म उपयोग करेंगे जिसकी मांग होगी। इसलिए उद्योग को मांग बढ़ाने की दिशा में पहल करनी होगी।
समस्या यह है कि इंडस्ट्री ने किसानों को यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया है कि उसे भविष्य में किस तरह की लकड़ी की जरूरत पड़ेगी। इंडस्ट्री किसानों को प्रोत्साहित नहीं करेगी और उन्हें एक निश्चित बाजार का भरोसा नहीं देगी, तब तक यह समस्या बनी रहेगी।
पाइन का आयात बढ़ रहा हैं, क्या ऐसा भी संभव है कि प्लाईवुड उद्योग पाइन लकड़ी पर आकर टिक जाए ?
प्लाईवुड उद्योग के लिए पाइन कोई बाय चॉइस नहीं है। फिलहाल इसकी खपत बढ़ने की वजह है, पाइन की लकड़ी सीधी होती है, गोलाई में होती है। कई देशों में यूक्लिप्टस और पाइन बहुतायत में उपलब्ध है।
समस्या यह है कि इंडस्ट्री ने किसानों को यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया है कि उसे भविष्य में किस तरह की लकड़ी की जरूरत पड़ेगी। इंडस्ट्री किसानों को प्रोत्साहित नहीं करेगी और उन्हें एक निश्चित बाजार का भरोसा नहीं देगी, तब तक यह समस्या बनी रहेगी।
पॉपुलर में बहुत सुधार हुआ है। विदेशों में फारेस्ट्री 12 साल 15 साल 18 साल तक के लगाए जाते हैं। वहां पे पौधा रोपन का क्षेत्र किलोमीटर्स में होता है। कटाई भी उसी अनुपात में होती है। आयातित कच्चे माल को लेकर भविष्य में क्या समस्या आ जाए, इस बारे में कुछ नहीं बोला जा सकता। इसलिए भले ही आज पाइन का उपयोग प्लाईवुड में हो रहा है,लेकिन पॉपुलर की जगह पाइन नहीं ले सकती।
2030 तक आने वाले कार्बन न्यूट्रैलिटी नियमों और पेरिस समझौते का हमारी इंडस्ट्री पर क्या असर पड़ेगा?
भारत ने पेरिस समझौते (Paris Agreement ) पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसका मतलब है कि हमें अपने कार्बन उत्सर्जन को कम करना होगा। 2030 एक ऐसी समय-सीमा है जिसके बाद हर इंडस्ट्री को, चाहे वह छोटी हो या बड़ी, अपना कार्बन ऑडिट कराना अनिवार्य हो जाएगा।
भारत को नेट जिरो उत्सर्जन 2050 तक ने 50 प्रतिशत करना है। 2070 तक भारत पर बाध्यता है कि जितना कार्बन निकालेंगे, उतना ही खत्म करने के लिए कदम उठाएंगे। इसके लिए समय समय पर ऑडिट होगा।
उद्योग को यह हिसाब देना होगा कि वे कितना कार्बन उत्सर्जित करते हैं। यह उत्सर्जन सिर्फ फैक्ट्री से नहीं, बल्कि कच्चे माल की ढ़ुलाई में इस्तेमाल वाहनों पर होने वाले डीजल जैसे कारकों को भी जोड़ा जाएगा।
जिन उद्योगों का कार्बन फुटप्रिंट ज्यादा है, जैसे थर्मल पावर और कंस्ट्रक्शन, उन पर सबसे ज्यादा दबाव होगा। तब इंडस्ट्री कैसे कार्बन कम कर रही है, प्रत्येक लकड़ी उद्योग को भी यह बताना होगा।
तो क्या यह नियम टिम्बर इंडस्ट्री के लिए एक चुनौती ही है या इसमें कोई अवसर भी छिपा है?
यह टिम्बर इंडस्ट्री के लिए एक अद्वितीय अवसर है। पेड़ कार्बन डाइऑक्साइड को सोखते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं। इसलिए, हमारी लकड़ी इंडस्ट्री स्वाभाविक रूप से कार्बन कम करने का काम करती है।
क्योंकि लकड़ी उद्योग तो पौधा रोपण को बढ़ावा देती है। अब जो कंपनियाँ खुद के प्लांटेशन लगाएंगी, वे यह दावा कर सकती हैं कि वे कार्बन न्यूट्रल हैं। उदाहरण के लिए, अगर आपका फसल चक्र चार साल का है, और हर साल आप 25 प्रतिशत करते हैं। तो आप कह सकते हैं कि आपके 75 प्रतिशत पेड़ हमेशा कार्बन सोखने का काम कर रहे हैं। इससे न केवल नियमों का पालन होगा, बल्कि कंपनी की एक अच्छी छवि भी बनेगी। इसमें जितने ज्यादा लोग शामिल होंगे, परिणाम उतने ही अच्छे आएंगे।
इन समस्याओं से निपटने के लिए आप क्या ठोस समाधान सुझाते हैं?
सबसे कारगर तरीका Consortium अप्रोच है। इसका मतलब है कि कई कंपनियाँ मिलकर एक समूह बनाएं और रिसर्च, डेवलपमेंट (R&D) और प्लांटेशन पर मिलकर निवेश करें। इससे किसी एक कंपनी पर बोझ नहीं पड़ेगा और सभी को अच्छी गुणवत्ता वाला कच्चा माल मिल सकेगा।
लेकिन इसकी सबसे बड़ी बाधा शायद उद्योगपतियों का आपसी अविश्वास या प्रतिस्पर्धा है। जब तक यह मानसिकता नहीं बदलेगी, मिलकर काम करना मुश्किल होगा। हम अपने स्तर पर भी प्रयास कर रहे हैं। लेकिन इसमें उद्योग को भी आगे आना होगा। सभी को भागीदारी निभानी होगी। पैसा कहां से आएगा? इसका प्रबंध भी सबने मिलकर करना होगा।
सभी कंपनी यां एक व्यापक सोच सामने रख कर काम करें तो समस्या का समाधान हो सकता है। आने वाले समय में सरकार यह तय करेगी कि किस स्तर की कंपनी को कार्बन क्रेडिट से कितनी छूट दी जा सकती है।
हमें पौधा रोपण को अध्यात्म से जोड़ कर देखना चाहिए। क्योंकि यह सिर्फ व्यापार नहीं बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी भी है। मिल कर कम्यूनिटी पौधा रोपण किया जा सकता हैं। एक फँड बनाया जा सकता है। इसमें जमीन और किसानों को चिंहित करना होगा। जमीन कही भी ली जा सकती है, क्योंकि लकड़ी का परिवहन तो किया ही जा सकता है।
आपने एक बहुत ही दिलचस्प सुझाव दिया कि वृक्षारोपण में निवेश को धर्माथा की तरह देखा जाना चाहिए।
हाँ, मेरा मानना है कि यह मानसिकता में बदलाव ला सकता है। हमारे उद्योगपति धार्मिक कार्यों और दान-दक्षिणा में बहुत पैसा खर्च करते हैं। अगर वे वृक्षारोपण को भी एक धार्मिक या पुण्य का काम (धर्म-कर्म) मानें, तो वे इसमें निवेश करने से हिचकिचाएंगे नहीं। बल्कि, निवेश पर लाभ की आशा किए वगैर ही वृक्षा रोपण में निवेश करेंगे। इसे बिजनेस के नफे-नुकसान से अलग हटकर एक सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के रूप में देखना चाहिए।
यह एक बहुत अच्छा कॉन्सेप्ट है जो लंबी अवधि के निवेश को प्रोत्साहित कर सकता है। क्योंकि तब निवेश करने वाला इसमें नफा नुकसान नहीं सोचेंगे। इसे एक खुद से प्रेरित कदम मान कर काम करेंगे। जिसके बहुत ही सकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं।
इसमें सरकारी नीतियों की क्या भूमिका है?
सरकार की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। मुझे जानकारी मिली है कि मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह जी उद्योग की समस्याओं से अवगत हैं। उन्हें यह भी पता है कि कैसे, कई बार किसान अपनी उपज दलालों को औने-पौने दाम पर बेचने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
सरकार के स्तर पर यह विचार चल रहा है कि टीक (Teak) और शीशम जैसी कुछ प्रजातियों को कठोर नियमों से बाहर किया जाए, ताकि किसान उन्हें आसानी से काट और बेच सकें।
कीर्तिसिंह के पिता ने अपने इलाके मे एक प्रयोग किया था, वह अपने इलाके में जब भी किसी के यहां बच्चा जन्म लेता था तो वह शगुन के तौर पर टीक के पौधे देते थे। कहते थे, यह पौधे लगा लो, बच्चे के भविष्य मे काम आएंगे। उनके प्रयास से उनके क्षेत्र में बहुत बड़ा टीक के जंगल बन गया है। अब जब भी टीक काटने पर सरकार की पाबंदी हटती है तो इस क्षेत्र में अपनी तरह की आर्थिक तरक्की आएगी।
अंत में, आप उद्योग को क्या संदेश देना चाहेंगे?
मेरा संदेश सीधा हैः अब जागने का समय आ गया है। उद्योग को यह मानना होगा कि समस्या वास्तविक है और यह हम सबकी है। प्लाईवुड इंडस्ट्री की विशेषकर यह कमी रही है कि वह हमेशा अल्पकालिक (Shorterm) सोच रखती है और भविष्य की योजना नहीं बनाती।
लेकिन अब पर्यावरण के नियम और कच्चे माल का संकट एक ‘‘डंडे‘‘ की तरह हैं। लकड़ी उद्योग में क्यूसीओ लागू हो गया है। अब जागरूक होना ही होगा। अगर अब भी उद्योग ने मिलकर सही दिशा में कदम नहीं उठाए, तो भविष्य की राह बहुत मुश्किल होगा।
सहयोग, दूरदर्शिता और सही निवेश ही आगे का रास्ता है।
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