प्लाईवुड उद्योग में आ रही चुनौतियों से परिस्थितियां विपरीत हो रही है
- अक्टूबर 10, 2025
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प्लाईवुड उद्योग में अभी की स्थिति को कैसे देखते हैं, भविष्य से क्या उम्मीद है’’
क्यूसीओ आया तो उम्मीद थी कि परिस्थियों में सुधार आएगा। लेकिन ऐसा होता अभी तो नजर नहीं आ रहा है। जो परिस्थितियां है, इसमें तो मुझे ऐसा लगता है कि आने वाले वक्त में भी इस तरह के चौलेंज रहेंगे। सबसे बड़ी समस्या तो कच्चे माल की उपलब्धता को लेकर आ रही है। लकड़ी की मांग और आपूर्ति में जो उतार चढ़ाव है, इससे उद्योगपति तय ही नहीं कर पा रहे कि कैसे तालमेल बनाए। अब यदि मंडी में लकड़ी का भाव 50/100 रूपए भी कम होता हैं तो किसान लकड़ी की कटाई ही बंद कर देते हैं। अगले दिन दाम अपने आप उपर चला जाता है।
आप इन चुनौतियों को कैसे देखते हैं?
यह एक मुश्किल वक्त है। इससे तो प्लाईवुड उद्योग में काम करना ही मुश्किल हो रहा है। किसी भी उद्योग के विकास के लिए कच्चे माल की यह अनिश्चितता काफी दिक्कत देती है। पूरी प्लानिंग बिगड़ जाती है। टारगेट पूरे नहीं होते, यदि होते हैं तो उत्पादन लागत ज्यादा आती है।
क्यूसीओ के बाद प्लाईवुड का आयात या तो बंद हो गया या कम हो गया। नेपाल से बहुत कम माल भारत आ रहा है। पहले बोल दिया जाता था कि आयातित सस्ते माल की वजह से समस्या आ रही है। अब तो आयात लगभग बंद है। बाजार में प्लाईवुड की मांग भी बढ़ी है। हम यह नहीं कह सकते कि बाजार रिस्पांस नहीं कर रहा है।
कच्चा माल को आयात करना भी तो समस्या का समाधान हो सकता है?
जी हां, आयतित पाइन और यूकेलिप्टस से फैक्ट्री संचालक कुछ हद तक काम चला रहे हैं। लेकिन आयात का भी कोई निश्चित पैरामीटर नहीं है कि कब डॉलर की कीमत बढ़ जाए या घट जाए। यह स्थिति खासी तकलीफ देती है। उद्योगपति सारा दिन इसी जद्दोजहद में लगा रहता है। कभी माल की कमी, तो कभी कोई जहाज लेट हो जाता है, लेकिन इंडस्ट्री तो नहीं रुकती। अंत में सवाल वही रहता है, ‘‘कच्चे माल का प्रबंध कैसे हो’’।
फिर मौसम भी अब बहुत ज्यादा प्रभावित कर रहा है। जैसे इस बार बारसात की वजह से पूरा सिस्टम ही गड़बड़ा गया। प्लांट पर जितना निवेश किया, उसके बदले जो रिटर्न आ रहा हैं, वह कम हो रहा है। जिससे निराशा आती है।
क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर (QCO) के बाद उद्योग में क्या बदलाव नजर आ रहा है?
देखिये, QCO तो लागू हो गया है, लेकिन BIS वाले न तो इंडस्ट्री पर और न ही ट्रेडर पर अपनी तरफ से कोई दबाव डालेंगे। अगर वे ट्रेडर पर दबाव डालते हैं, तो यह उद्योग के लिए बहुत अच्छा होगा। पर ऐसा जमीन पर होता नजर नहीं आ रहा है। इसकी वजह यह है कि उनके पास काम करने के लिए पर्याप्त लोग ही नहीं हैं। उनका काम करने का तरीका यह है कि अगर कोई व्यक्ति लिखित में शिकायत करता है, तभी वे कार्रवाई करते हैं। लेकिन ऐसा कोई क्यों करेगा? क्योंकि यह काम तो बीआईएस का होना चाहिए, वह स्वयं खोजे की कहां नकली ISI का माल बेचा जा रहा हैं। उन्हें अपने स्तर पर कार्रवाई करनी चाहिए, जो वे करना नहीं चाहते।
अब हो यह रहा है कि वर्त्तमान लायसेंस धारकों के कहीं से भी सैंपल उठा लेंगे। यदि सैंपल की रिपोर्ट गलत आ गयी तो उत्पादन बंद करा देंगे। जबकि होना तो यह चाहिए कि जो नकली माल बेच रहा है, उसके खिलाफ कार्यवाही की जाए।
लोग आयातित टिम्बर लाने के बजाय गांधीधाम में ही पीलिंग यूनिट लगाकर कोर ला रहे हैं।
काफी लोगों ने गांधीधाम में पीलिंग यूनिट लगाई हैं। अब जिसे इंडस्ट्री चलानी है, उसे किसी भी तरह से कच्चे माल का प्रबंध तो करना ही पड़ेगा, नहीं तो ओवरहेड खर्चे आपको खत्म कर देंगे। यह सर्वाइवल फॉर द फिटेस्ट” वाला मामला है, इसलिए लोग कच्चे माल के लिए इधर-उधर जा रहे हैं। इन सभी की एक कोशिश है कि किसी भी तरह से उत्पादन लागत कम की जाए।
कच्चे माल की कमी को पूरा करने की यह कोशिश है। जो उद्योग को लेकर एक सकारात्मक उम्मीद तो पैदा करती है।
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