जंग की अर्थ व्यवस्था अहम्
- मार्च 14, 2026
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हमें यह स्वीकार करना होगा कि दुनिया अब पहले की तुलना में अधिक संघर्षपूर्ण हो चुकी है इस स्थिति में सबसे बड़ी जरूरत हमारे सोचने के तरीके में बदलाव की है। अब हमें केवल एक शांतिप्रिय गणराज्य बनकर परिस्थितियों को सहने की मानसिकता से आगे बढ़ना होगा और हर संभावित चुनौती के लिए तैयार रहना होगा।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि भारत को पूरी तरह युद्ध पर आधारित अर्थव्यवस्था बनना चाहिए। लेकिन हमें ऐसी अर्थव्यवस्था बनानी होगी जो जरूरत पड़ने पर तेजी से अपनी औद्योगिक और तकनीकी क्षमता का इस्तेमाल तैयार कर सके।
यूक्रेन और ईरान से जुड़े युद्धों से एक और महत्त्वपूर्ण सबक मिलता है कि केवल मजबूत होना पर्याप्त नहीं है विशेषतौर पर तब जब विरोधी पक्ष युद्ध की आंच को नागरिक और औद्योगिक ढांचे तक फैलाने में सक्षम हो।
रूस ने व्यवस्थित तरीके से यूक्रेन के बिजली तंत्र और अन्य बुनियादी ढांचे को नष्ट किया है जबकि इजरायल ने गाजा में भी इसी तरह के हमले किए। अब ईरान भी केवल अमेरिका और इजरायल के सैन्य ठिकानों को ही नहीं, बल्कि कई देशों के नागरिक ठिकानों को निशाना बना रहा है जैसे कि कतर, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), बहरीन, कुवैत, इराक, ओमान और यहां तक कि सऊदी अरब तथा साइप्रस को भी।
यह अक्सर एक पक्ष की रणनीति होती है, जिसमें वह इतनी व्यापक तबाही मचाने की कोशिश करता है कि ताकतवर दुश्मन भी यह सोचने लगता है कि यह लड़ाई जारी रखना उचित भी है या नहीं।
यदि औद्योगिक और नागरिक ढांचे को लक्षित किया जाता है, मसलन बिजली, रिफाइनरी या जल आपूर्ति बाधित होती है, तब सरकार और पुलिस के बीच प्रभावी समन्वय होना चाहिए, ताकि जनता को शांत रखा जा सके और आपूर्ति बहाल की जा सके।
हमें केवल युद्ध सामग्री ही नहीं बल्कि ऊर्जा और अन्य आवश्यक वस्तुओं के भी पर्याप्त भंडार रखने चाहिए। ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट को बाधित करना दिखाता है कि तेल भंडार, युद्ध और नागरिक दोनों की जरूरतों के लिए कितना महत्त्वपूर्ण है।
हमें युद्ध के दौर के लिए मीडिया और सोशल मीडिया प्रोटोकॉल तैयार करने होंगे ताकि दुश्मन फर्जी और भ्रामक जानकारी के जरिये जनता का मनोबल तोड़ न सके।
दुनिया अब सुरक्षित नहीं है और हमें किसी भी चुनौती के लिए पूरी तरह तैयार रहना होगा।
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