पश्चिम एशिया में छिड़ी जंग ने वैश्विक आर्थिक मंदी के हालात निर्मित किए हैं, इस निराशा का प्रसार भारत तक भी हुआ है और इसके चार अलग-अलग माध्यम रहे हैंरू गैस की कमी, तेल कीमतों में इजाफा, विदेश से आने वाले धन में कमी और पश्चिम एशिया से निर्यात मांग में कमी।

यह भारत के लिए प्रतिकूल वृहद् आर्थिक झटका लाने वाला साबित हो रहा है। आखिर अर्थव्यवस्था इस बाहरी माहौल के साथ किस प्रकार समायोजन करे? स्थिरता किन कारकों से आएगी?

कुछ प्रकार की स्थिरता के लिए सरकरी कदमों की आवश्यकता होती है तो वहीं कुछ बिना प्रयास यानी स्वचालित तरीके से तैयार होती हैं। उनके मामले में केवल सरकार को हाशिए से नजर रखने की आवश्यकता होती है।

हमारे लिए इस वैश्विक अव्यवस्था में आर्थिक समायोजन का सबसे बड़ा मार्ग विनिमय दर का अवमूल्यन है। कमजोर रुपया सापेक्ष कीमतों में बदलाव लाता है, जो अर्थव्यवस्था की मदद करता है।

कमजोर रूपये से आयातित वस्तुओं के दाम बढ़ते हैं। ऊंची कीमतों के कारण भारत के लोग कम आयात करेंगे। वे अपनी खपत में बदलाव करेंगे और भारतीय कंपनियों से अधिक खरीदेंगे, जिससे घरेलू मांग को बल मिलेगा।

बाहरी मोर्चे पर, कमजोर रुपया भारतीय निर्यात को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाता है, जिससे विदेशी खरीदार भारत से अधिक खरीदते हैं।


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