कई बार सरकारी नीतियां और अदालत के निर्णय एक ऐसी स्थिति पैदा कर देते हैं, जिससे हर किसी को समस्या आ जाती है।

हालिया उदाहरण इंडिगो का लिया जा सकता है। यह समस्या क्यों आई। जाहिर है नए नियमों के आदेश पारित होने के बाद सही तैयारी नहीं थी। लेकिन सवाल यह है कि क्या इंडिगो ने तैयारी नहीं की या कंपनी यह तैयारी इतने समय में करने में सक्षम नहीं थी। इस पर अनूपालक (DGCA) द्वारा समय समय पर निगरानी क्यों नहीं की गई, यह बहस का विषय हो सकता है।

इसी तरह का एक निर्णय उद्योग में केंद्र सरकार द्वारा तकनीकी यूरिया (Technical Urea) के उपयोग को अनिवार्य करने का हैं। इसके पीछे सोच थी कि कृषि-ग्रेड यूरिया के औद्योगिक दुरुपयोग को रोका जाए। लेकिन यह निर्णय लागू करने को लेकर जो तैयारी करनी चाहिए थी, वह हुई नहीं। मसलन उद्योग को पर्याप्त मात्रा में टैक्नीकल यूरिया मिले, इसके लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए।

सरकार की सख्ती से बढ़ी चिंता

सरकार ने हाल ही में सब्सिडी वाले कृषि यूरिया के औद्योगिक उपयोग पर रोक लगाने के लिए निगरानी तेज की है। साथ ही, गैर-BIS लाइसेंसधारी इकाइयों को बंद करने और प्लाइवुड उद्योग में केवल तकनीकी यूरिया के उपयोग पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि सरकार का उद्देश्य गुणवत्ता सुधार और दुरुपयोग रोकना है, लेकिन उद्योग का दावा है कि तकनीकी यूरिया न तो पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है और न ही इसकी कोई संगठित सप्लाई चेन मौजूद है।

एक उद्योग प्रतिनिधि ने कहा, यदि सप्लाई की गारंटी के बिना सख्ती लागू की गई, तो इसका नतीजा केवल अव्यवस्था और उत्पादन ठप होने के रूप में सामने आएगा।

सप्लाई गैप से उत्पादन पर खतरा

प्लाइवुड उद्योग में यूरिया का उपयोग रेज़िन निर्माण में होता है। तकनीकी यूरिया का उत्पादन सीमित है, कीमत अधिक है और यह सभी औद्योगिक क्षेत्रों में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है। विशेष रूप से MSME इकाइयाँ सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही हैं। कई फैक्ट्रियाँ या तो आधी क्षमता पर चल रही हैं या बंद होने की कगार पर है।

विशेषज्ञों के अनुसार इसके परिणाम हो सकते हैं:

  • प्लाइवुड क्लस्टर्स में उत्पादन ठप होना
  • हजारों मजदूरों की नौकरी पर असर
  • प्लाइवुड और फर्नीचर के दामों में तेज़ बढ़ोतरी
  • अवैध सप्लाई और ब्लैक मार्केटिंग को बढ़ावा

1996 के सुप्रीम कोर्ट आदेश की याद

उद्योग जगत को 1996 के सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश की भी याद आ रही है, जब उत्तर-पूर्वी राज्यों में पर्यावरण संरक्षण के नाम पर प्रायः सभी प्लाइवुड इकाइयाँ बंद कर दी गई थीं। उस फैसले से बड़े पैमाने पर उद्योग पलायन को मजबुर हुए, रोजगार खत्म हुआ और आर्थिक नुकसान हुआ। विश्लेषकों का मानना है कि यदि तकनीकी यूरिया पर मौजूदा नीति को बिना योजना के लागू किया गया, तो इतिहास खुद को दोहरा सकता है।

उद्योग से संवाद की कमी

उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि अब तक कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं आया है:

  • तकनीकी यूरिया उत्पादन कैसे बढ़ेगा
  • कीमतों को कैसे नियंत्रित किया जाएगा
  • BIS अनुपालन के लिए संक्रमण काल कितना होगा
  • छोटे और मध्यम उद्योगों को क्या राहत मिलेगी

उत्तर भारत के एक प्लाइवुड निर्माता ने कहा, ‘नीतियों का उद्देश्य सही हो सकता है, लेकिन ज़मीनी तैयारियों के बिना उनका क्रियान्वयन खतरनाक साबित होगा।‘

संतुलित नीति की मांगः

प्लाइवुड उद्योग सरकार से मांग कर रहा है किः

  • चरणबद्ध तरीके से नियम लागू किए जाएं
  • तकनीकी यूरिया के लिए समर्पित उत्पादन और वितरण प्रणाली बने
  • व्यावहारिक समय-सीमा दी जाए
  • उद्योग संगठनों से व्यापक परामर्श किया जाए

उद्योग का स्पष्ट संदेश है कि बिना बुनियादी ढांचे के, अत्यधिक पुलिसिंग और जल्दबाज़ी, उस सेक्टर को अस्थिर कर सकती है जो देशभर में लाखों लोगों को रोजगार देता है।