वर्तमान समय में पैनल उद्योग एक अत्यंत कठिन दौर से गुजर रहा है। बाजार की स्थिति बेहद कमजोर बनी हुई है और पूरे भारत में कुल बिक्री लगभग 50 प्रतिशत के आसपास ही रह गई है। दूसरी ओर उद्योग कच्चे, माल, श्रमिकों की कमी और बढ़ती परिचालन लागत जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है।

हमारा प्लाईवुड एवं पैनल उद्योग काफी हद तक आयात पर निर्भर है, जिसमें टिम्बर, कोर विनियर, फेस विनियर तथा विभिन्न रसायन शामिल हैं। इन आयातित सामग्रियों के बिना उद्योग का सुचारु रूप से संचालन करना काफी कठिन हो जाता है।

वर्तमान स्थिति को देखते हुए, व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि हमें आयातित प्लाईवुड को लेकर अत्यधिक चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि अमेरिकी डॉलर (USD) के प्रभाव और बढ़ी हुई लॉजिस्टिक लागत के कारण आयातित प्लाईवुड स्वयं ही काफी महंगा हो चुका है।

मैं उद्योग के समक्ष कुछ विनम्र सुझाव रखना चाहता हूँ:

  1. आयातित प्लाईवुड पर न्यूनतम आयात मूल्य (MIP)

DPIIT तथा अन्य संबंधित विभागों के सहयोग से आयातित प्लाईवुड पर Minimum Import Price (MIP) लागू करने पर विचार किया जा सकता है। यदि कोई उच्च कीमत पर भी आयात करना चाहता है तो वह जारी रख सकता है, लेकिन इससे घरेलू निर्माताओं को अनुचित मूल्य प्रतिस्पर्धा से सुरक्षा मिलेगी।

  1. भारतीय विनिर्माण क्षमता की मजबूती

आज भारत में अनेक आधुनिक एवं तकनीकी रूप से उन्नत प्लाईवुड फैक्ट्रियां मौजूद हैं, जो फर्नीचर और इंटीरियर उद्योग के लिए उच्च गुणवत्ता वाला प्लाईवुड बनाने में सक्षम हैं। घरेलू विनिर्माण क्षमता पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हो चुकी है।

  1. परिवहन लागत में कमी पर ध्यान

आज उद्योग की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक भारत के भीतर परिवहन लागत है। कई मामलों में वियतनाम से कंटेनर मंगाना, भारत के भीतर गांधीधाम या उत्तर प्रदेश से दक्षिण भारत तक माल भेजने की तुलना में सस्ता पड़ रहा है। उदाहरण के लिए, गांधीधाम/उत्तर प्रदेश से दक्षिण भारत तक 27 टन माल के परिवहन का खर्च लगभग ₹1,80,000 तक पहुँच चुका है।

हमें सामूहिक रूप से संबंधित अधिकारियों से चर्चा कर रेलवे फ्रेट इंफ्रास्ट्रक्चर, वैगन एवं कंटेनर उपलब्धता में सुधार की मांग करनी चाहिए, विशेष रूप से निम्न प्रमुख विनिर्माण क्लस्टर्स के लिएः उत्तर प्रदेश, गांधीधाम, केरल, बिहार, हरियाणा।

यदि लॉजिस्टिक लागत में मात्र 5 प्रतिशत की भी कमी आती है, तो इसका उद्योग पर अत्यंत सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। जैसा कि हम जानते हैं, कुछ पोर्ट-आधारित भारतीय फैक्ट्रियां पहले से ही परिवहन लागत कम करने के लिए तटीय/घरेलू समुद्री मार्गों का उपयोग कर रही हैं।

  1. BIS लागूकरण एवं निगरानी में तेजी

BIS लागू हुए लगभग 18 महीने हो चुके हैं, लेकिन इसकी प्रगति अभी भी काफी धीमी दिखाई देती है। उद्योग की जानकारी के अनुसार, वर्तमान में केवल लगभग 1,200 फैक्ट्रियों के पास सक्रिय ISI लाइसेंस हैं, जबकि कई अन्य अभी भी बिना उचित अनुपालन के संचालन कर रही हैं। यदि निगरानी और नियंत्रण को अधिक सख्त किया जाए, तो इससे घरेलू बाजार का वातावरण बेहतर होगा और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित की जा सकेगी।

  1. आयातित सामग्री की गुणवत्ता जांच

हमें संबंधित विभागों से यह भी अनुरोध करना चाहिए कि आयातित कंटेनरों की BIS मानकों के अनुसार रैंडम गुणवत्ता जांच की जाए। इससे गुणवत्ता मानकों को बनाए रखने तथा घरेलू उत्पादकों और आयातित उत्पादों के बीच निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।

उपरोक्त सभी बिंदु केवल उद्योग में सुधार और सामूहिक चर्चा के उद्देश्य से विनम्र सुझाव के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं।