भारत के नए लेबर कोड-चार व्यापक कानून जो 29 पुराने क़ानूनों की जगह लाने के लिए बनाए गए हैं-अनुपालन को सरल बनाने, सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाने, और कंपनियों को नियुक्ति-निकासी तथा विस्तार में अधिक लचीलापन देने का वादा करते हैं। लेकिन भारत में शानदार दिखने वाले सुधारों का क्रियान्वयन बिगाड़ देने की पुरानी आदत है। क्या नए कोड भी उसी परंपरा में शामिल हो जाएंगे?

हाल के वर्षों में देश के आर्थिक सुधार इसी चक्र से गुज़रे हैं:

दिल्ली में महत्वाकांक्षी कानून, राज्यों में अधूरी-अधूरी क्रियान्वयन प्रक्रिया, और अंततः ऐसा नतीजा जो मूल इरादों से बहुत दूर हो। उदाहरण के लिए, दिवालियापन एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) को तेज़ और सख़्त तंत्र के रूप में बनाया गया था ताकि डिफ़ॉल्टर उधारकर्ताओं पर लगाम लगाई जा सके। लेकिन यह जल्द ही अदालती देरी, प्रक्रियागत उलझनों और भ्रष्टाचार में फंस गया। देरी और सिस्टम का दुरुपयोग आम बात हो गई।

रियल एस्टेट (विनियमन एवं विकास) अधिनियम (रेरा), जिसे घर-खरीदारों की सुरक्षा के लिए बनाया गया था, राज्य-स्तरीय कमज़ोर नियमों के पैबंद से ढक गया। यहां तक कि वस्तु एवं सेवा कर (GST)-दशकों का सबसे बड़ा वित्तीय सुधार-भी अब तक जटिल नियमों और असमान प्रवर्तन के साथ “प्रगति पर” ही है।

’’पहली बाधार: भारत का संघवाद’’

हालाँकि लेबर कोड केंद्रीय क़ानून हैं, परंतु श्रम संविधान की समवर्ती सूची में आता है। इसका मतलब है कि राज्यों को अपने नियम बनाने और क्रियान्वयन करना होगा। पिछली मिसालों में कुछ राज्यों ने ईमानदारी दिखाई है, पर ज़्यादातर ने नहीं। परिणामस्वरूप, एक फैक्ट्री अलग-अलग राज्यों में अलग तरीक़े से नियंत्रित हो सकती है। हालांकि नए कोड इन असमानताओं को दूर करने का वादा करते हैं। लेकिन यदि राज्य देरी करें या अपनी-अपनी व्याख्या गढ़ें, तो ये कोड अपने उद्देश्य से भटक जाएंगे।

’’दूसरी समस्यार: शासन क्षमता और गुणवत्ता’’

कोड यह मानकर चलते हैं कि देश में मज़दूर पंजीकरण के लिए डिजिटल सिस्टम हैं, जोखिम-आधारित निरीक्षण के लिए एल्गोरिद्म हैं, और करोड़ों ऑनलाइन अनुपालनों को संभालने वाले कुशल प्रशासक मौजूद हैं। वास्तविकता इससे काफी कमतर है।

भारत की सरकारी मशीनरी आमतौर पर कम प्रशिक्षित, ढीली निगरानी में और भ्रष्टाचार से प्रभावित रहती है। जहां डिजिटल व्यवस्था है भी, वह दबाव में अक्सर टूट जाती है। डिजिटल अनुपालन पर अत्यधिक भरोसा किया गया है-ई-फाइलिंग,

ऑनलाइन शिकायत निस्तारण, और आधार से जुड़े सामाजिक सुरक्षा खाते। पर भारत का डिजिटल परिदृश्य अभी भी असमान है। भारत कई डिजिटल कल्याण योजनाएँ बना चुका है, जो क्रियान्वयन से ज़्यादा डेटाबेस के रूप में ही रहती हैं। ऐसे में यह उम्मीद कि लेबर कोड उन क्षेत्रों में सफल होंगे जहाँ बाकी योजनाएँ लड़खड़ा गई हैं -आशावादी नहीं, बल्कि कल्पनाशील सोच लगती है।

’’तीसरी चुनौतीर: लोकलुभावन राजनीति’’

भारत में सुधार आर्थिक आवश्यकता से ज़्यादा राजनीतिक जोखिम से प्रभावित होते, और राजनेता इन सुधारों को कमजोर या स्थगित कर सकते हैं। हैं। रेरा राज्य संशोधनों से कमजोर पड़ा; GST दरें राजनीतिक समझौतों से बढ़ीं। लेबर रिफॉर्म भी इसी तरह राजनीतिक पुनर्संतुलन का शिकार हो सकता है।

’’कोड नाकाम होंगे? ऐसा नहीं है’’

भारत में सुधार पूरी तरह विफल कम ही होते हैं। वे कुछ हिस्सों में सफल होते हैं, कुछ हिस्सों में लड़खड़ाते हैं, और अंत में एक अव्यवस्थित, मध्यम स्तर का संतुलन बना लेते हैं। GST बस ज़रूरत से ज़्यादा जटिल हो गया। प्ठब् धीमा और असमान हो गया। रेरा गायब नहीं हुआ-कुछ जगह बस बेअसर हो गया।

लेबर कोड भी उसी राह पर चल सकते हैं:

कुछ राज्यों में आंशिक रूप से सफल, अन्य राज्यों में लगभग अनदेखे, और पूरे देश में असंगत रूप से लागू। ये विनिर्माण को सेवाओं की तुलना में अधिक मदद कर सकते हैं, बड़ी कंपनियों को MSME की तुलना में अधिक लाभ दे सकते हैं, और दस्तावेज़युक्त श्रमिकों को असंगठित बहुसंख्यक की तुलना में अधिक फायदा पहुँचा सकते हैं।

’’भारत को चाहिए:मज़बूत डेटा प्रणाली’’

आधुनिक श्रम विनियमन रोजगार, आय, सुरक्षा, लाभ और अनुपालन पर विशाल तथा विश्वसनीय डेटा चाहता है।

भारत में सांख्यिकी बिखरी हुई हैं; सरकारी रिकॉर्ड असंगत हैं; सर्वेक्षण कम होते हैं। लेबर कोड एक ऐसे डेटा सिस्टम की कल्पना करते हैं जो अभी भारत के पास है ही नहीं। IBC की विफलता का एक कारण यह भी था कि सरकार नतीजों पर केंद्रित हस्तक्षेप करने में असफल रही और गलत नियुक्तियों के कारण ट्रिब्यूनल ओवरलोड हो गए। रेरा का प्रवर्तन भी राज्यों में असमान है।

कोई भी कानून उतना ही अच्छा होता है जितना अच्छा उसे लागू करने वाला राज्य तंत्र होता है-और भारत परिणाम-केंद्रित, कठोर प्रशासनिक अनुशासन के लिए मशहूर नहीं है।