पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा जनवरी 2026 में जारी उस परिपत्र, जिसमें वन भूमि पर सहायक वृक्षारोपण की अनुमति दी गई है, को लेकर हाल में आलोचनाएँ सामने आई हैं। कुछ लोगों ने इसे वनों के “औद्योगीकरण” की दिशा में कदम बताया है।

किंतु यदि इस निर्णय को गहराई से देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि यह सुधार सुव्यवस्थित, विनियमित और वैज्ञानिक वानिकी सिद्धांतों पर आधारित है। इसका उद्देश्य वनों का व्यावसायीकरण नहीं, बल्कि अवनत (degraded) वन क्षेत्रों का पुनर्स्थापन, घरेलू लकड़ी सुरक्षा को सुदृढ़ करना और ग्रामीण आजीविका को मजबूत करना है।

यह परिपत्र समेकित वन संरक्षण दिशा-निर्देशों पर आधारित है और राज्यों को अनुमति देता है कि वे स्वीकृत कार्य योजनाओं (Working Plans) के अंतर्गत सहायक प्राकृतिक पुनर्जनन तथा वृक्षारोपण कार्य कर सकें। यह कार्य प्लांटेशन कंपनियों, बड़े किसानों और वुड-बेस्ड उद्योगों के सहयोग से किया जा सकता है।

किंतु महम्वपूर्ण तथ्य है कि, संपूर्ण परियोजना राज्य वन विभाग (SFDs) की कड़ी निगरानी में ही संचालित होगी।

महत्वपूर्ण बात यह है कि इन वृक्षारोपणों को वानिकी गतिविधि की श्रेणी में ही रखा गया है, जिससे वन भूमि की कानूनी स्थिति, पर्यावरणीय सुरक्षा उपाय और नियामकीय नियंत्रण यथावत बने रहते हैं।

भारत में वन प्रबंधन की परंपरा उत्पादन, संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन-तीनों उद्देश्यों के बीच संतुलन बनाए रखने की रही है। यह धारणा कि उत्पादक वृक्षारोपण, संरक्षण को कमजोर करता है, भ्रामक है। उत्पादन कार्य-परिपथ (working circles) लंबे समय से संरक्षण और पुनर्जनन क्षेत्रों के साथ सह-अस्तित्व में रहे हैं। सागौन, साल, बांस, शंकुधारी तथा ईंधन प्रजातियों के नियोजित वृक्षारोपण दशकों से वनों में वैज्ञानिक पद्धति से किए जाते रहे हैं।

उत्पादन-उन्मुख वानिकी कोई नई अवधारणा नहीं है। 1980 के दशक में स्थापित वन विकास निगमों (FDCs) को लगभग 11 लाख हेक्टेयर क्षेत्र उत्पादन वानिकी के लिए आवंटित किया गया था। इन पहलों से न तो व्यापक पर्यावरणीय जोखिम उत्पन्न हुए और न ही कानूनी संकट।

वर्तमान सुधार का उद्देश्य वर्षों की कठोर नियामकीय स्थिति के कारण अवनत और विरल हो चुके वन क्षेत्रों में वैज्ञानिक वानिकी को पुनर्जीवित करना है।

इस पहल में पर्यावरणीय सुरक्षा सर्वापरि है। अवनत क्षेत्रों का चयन, प्रजातियों का निर्धारण, रोपण घनत्व, चक्र अवधि तथा कटाई सीमा-सभी स्वीकृत कार्य योजनाओं के अनुसार विनियमित रहेंगे। प्रत्येक परियोजना के लिए विस्तृत परियोजना प्रतिवेदन (DPR) आवश्यक होगा, जिसमें क्षेत्र, प्रजाति संरचना, वानिकी पद्धतियाँ और सतत कटाई मानक स्पष्ट किए जाएंगे।

वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत सामुदायिक अधिकारों के कमजोर होने की आशंका भी निराधार है। यह परिपत्र किसी भी वैधानिक अधिकार को निरस्त नहीं करता। मान्यता प्राप्त अधिकार स्थापित परामर्श प्रक्रिया के अधीन सुरक्षित रहेंगे। बल्कि सुविचारित वृक्षारोपण कार्यक्रम रोजगार सृजन, आय स्थिरीकरण और राज्यों द्वारा निर्धारित राजस्व-साझेदारी तंत्र के माध्यम से ग्रामीण आजीविका को सशक्त बना सकते हैं।

खुले एवं झाड़ीदार वनों में सहायक पुनर्जनन का विरोध अक्सर पारिस्थितिक वास्तविकताओं की अनदेखी करता है। ऐसे अनेक क्षेत्र आक्रामक प्रजातियों, मृदा सख्ती, आग और अत्यधिक चराई के कारण गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हैं। इन अवनत वनों को स्वस्थ वनों के समान मानना पुनर्स्थापन प्रयासों को कमजोर करता है। अनुभव दर्शाता है कि FDC द्वारा विकसित वृक्षारोपणों में छत्रावरण (canopy cover) 30-40 प्रतिशत से बढ़कर 80-90 प्रतिशत तक हुआ है, जिससे मृदा आर्द्रता, जैव विविधता और उत्पादकता में सुधार हुआ है।

वित्तीय संसाधनों की कमी के कारण निर्धारित वानिकी कार्य अक्सर सीमित रह जाते हैं। विनियमित निजी भागीदारी निवेश को प्रोत्साहित कर सकती है, राज्य एजेंसियों पर वित्तीय दबाव घटा सकती है और बेहतर परिणाम सुनिश्चित कर सकती है-बिना नियामकीय नियंत्रण से समझौता किए।

कृषि भूमि का प्राथमिक उपयोग खाद्य और ऊर्जा फसलों के लिए होना चाहिए, विशेषकर जब जलवायु परिवर्तन पहले ही उत्पादन को प्रभावित कर रहा है। यद्यपि कृषि वानिकी लकड़ी आपूर्ति में योगदान देती है, परंतु यह छोटे भू-खण्डों, लंबी परिपक्वता अवधि और बाजार अस्थिरता जैसी संरचनात्मक चुनौतियों से जूझती है।

वर्तमान में भारतीय वुड-बेस्ड उद्योगों को घरेलू लकड़ी लगभग 200 डॉलर प्रति बोन ड्राई मीट्रिक टन (BDMT) की लागत से प्राप्त होती है, जबकि दक्षिण-पूर्व एशिया में यही लागत लगभग 100 डॉलर है। यह अंतर आयात को बढ़ावा देता है, विदेशी मुद्रा पर दबाव डालता है और घरेलू रोजगार को खतरे में डालता है।

अवनत वन भूमि पर उत्पादन वृक्षारोपण कच्चे माल की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित कर सकता है, जिससे कृषि वानिकी को भी अप्रत्यक्ष समर्थन मिलेगा। यह औद्योगिक व्यवहार्यता को सुदृढ़ करेगा और घरेलू लकड़ी की मांग को स्थिर रखेगा।

कॉर्पाेरेट कब्जे की आशंकाएँ भी अतिरंजित हैं। वन भूमि का स्वामित्व और नियामकीय अधिकार राज्य वन विभागों के पास ही रहेगा।

निजी भागीदारी केवल संविदात्मक होगी और कड़ी निगरानी के अधीन रहेगी। राजस्व-साझेदारी का ढाँचा राज्यों के विवेक पर होगा, जिससे सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल मजबूत हो सकते हैं।

सुव्यवस्थित वृक्षारोपण जलवायु लाभ भी प्रदान करते हैं-तेजी से कार्बन अवशोषण, मृदा कार्बनिक पदार्थ की पुनर्बहाली और प्राकृतिक वनों पर कटाई दबाव में कमी। आधुनिक वानिकी वनों को एक नवीकरणीय जैविक अवसंरचना के रूप में मान्यता देती है, जो पारिस्थितिक सेवाएँ, आजीविका, कार्बन भंडारण और औद्योगिक कच्चा माल-सभी एक साथ प्रदान कर सकती है।

वास्तविक खतरा वनों को उत्पादक बनाने में नहीं, बल्कि उन्हें निरंतर अवनत अवस्था में छोड़ देने में है, जबकि भारत लकड़ी आयात पर निर्भर बना रहे। वैज्ञानिक रूप से विनियमित उत्पादक वानिकी संरक्षण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, आयात में कमी और दीर्घकालिक स्थिरता के बीच संतुलित मार्ग प्रस्तुत करती है।

ऐसे सुधारों पर चर्चा तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए, न कि आशंकाओं पर। जिम्मेदार और वैज्ञानिक वन प्रबंधन औद्योगीकरण नहीं, बल्कि भारत के पारिस्थितिक और आर्थिक भविष्य को सुरक्षित करने की आवश्यक दिशा है।