आज के आधुनिक समय में प्लाईवुड मैन्युफैक्चरिंग उद्योग भारत में फल-फूल रहा है, यधपि विगत वर्षों में हमारे उद्योग में कई आधुनिक तकनीकों को अपनाकर प्लाईवुड की गुणवत्ता, प्रोसेस ऑटोमेशन और ऊर्जा संरक्षण के छेत्र में नए आयाम स्थापित किये हैं तब भी हमें यह महसूस होता है की हमारे प्लाईवुड को बनाने की लागत विश्व के अन्य देशों की तुलना में काफी अधिक हैं।

इसमें विशेष योगदान हमारे कच्चे माल में होने वाली वेस्टेज, प्रोडक्शन में अधिक ऊर्जा का इस्तेमाल, कारीगरों की अधिक संख्या और फाइनल प्रोडक्ट की रिजेक्शन है जो कि उद्योग को लाभ का सौदा बनने नहीं देती हैं।

जहाँ एक ओर अन्य देशों में उच्च गुणवत्ता का प्रोडक्ट काफी किफायती दामों पर बनाये जाते हैं वहीँ हमारे यहाँ उस गुणवत्ता का माल बनाने में काफी धन व्यय हो जाता है, जिससे उद्योगों की आर्थिकी पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

विगत दो वर्षों में हमारी एसोसिएशन की टीम द्वारा विदेशों में इस्तेमाल की जाने वाली प्रोसेस तकनीकों का विश्लेषण करने दौरान उनकी ओवरहेड कण्ट्रोल के मुख्य बिंदु यानि रेसिन बनाने की तकनीक के बारे में पता चला. उनका रेसिन जो की फॉर्मलडीहाइड की सिमित उत्सर्जन मात्रा को ध्यान में रख कर बना होता है और यह रेसिन मैन्युफैक्चरर को गीली कोर के इस्तेमाल कर उच्च गुवत्ता वाले माल को बनाने की शक्ति प्रदान करता है. आज हम इसी विषय पर प्रकाश डालेंगे।

हमरे देश में प्लाइवुड मैन्युफैक्चरिंग के कुछ निम्न चरण होते हैंः

  1. ग्राहक से ऑर्डर प्राप्त करना
  2. प्रोडक्शन प्लानिंग करना
  3. कच्चे माल का इन्तेजाम
  4. विनियर को सुखाना
  5. प्लाईवुड की असेंबली
  6. उत्पाद की हॉट प्रेसिंग
  7. प्रोडक्ट की फिनिशिंग
  8. प्रोडक्ट की टेस्टिंग
  9. डिस्पैच

यह हमारे देश में साधारणतया प्लाईवुड बनाने का प्रोसेस हैं, लेकिन प्रोडक्शन के शुरुआती स्टेज में हमें सही प्रोडक्शन के लिए विनियर को सुखाने की एक बड़ी समस्या (विशेषकर बरसात और सर्दियों में) का सामना करना पड़ता है। ज़्यादातर इंडस्ट्री विनियर में 6-8 प्रतिशत नमी के साथ प्रोडक्ट बनाया जाता हैं। यदपि इंडस्ट्री भली भांति जानती हैं कि प्लाइवुड मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस में ज़्यादा नमी वाले विनियर के इस्तेमाल के क्या फायदे हैं किन्तु सही और पूरी तकनीक देश में उपलब्ध न होने के कारण इसी प्रोसेस को अपनाकर प्लाईवुड का निर्माण करती है।

अपने रिसर्च वर्क के दौरान के हमने ज़्यादा नमी वाले विनियर के साथ प्लाइवुड बनाने में कुछ विशेष फायदे देखे हैं, उनमे से कुछ निम्न प्रकार से हैं।

  1. हमने देखा है कि प्लाइवुड मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस में विनियर की बर्बादी कम से कम 15 प्रतिशत होती हैं, जो प्रोडक्ट की हैंडलिंग, ड्राईग, सिकुडन और असेंबली के कारण होती है, जबकि ज़्यादा नमी वाले विनियर में बर्बादी ज़्यादा से ज़्यादा 5 प्रतिशत ही होती है जिसे लगभग 2 प्रतिशत तक लाया जा सकता हैं।
  2. उच्च नमी वाली कोर विनियर मैन्युफैक्चरर को लगातार प्रोडक्शन करने का अवसर प्रदान करती है।
  3. हाई मोइस्चर वाली विनियर से बनी प्लाईवुड में डिफेक्ट-फ्री प्लाइवुड का निर्माण होता है जिससे फाइनल प्रोसेस में रिजेक्शन लेवल ज़्यादा से ज़्यादा 1-2 प्रतिशत होता है जबकि साधारण पारंपरिक प्रोसेस में यह करीब 5-10 प्रतिशत तक चला जाता है।
  4. हाई मोइस्चर वाली विनियर के साथ प्लाईवुड बनाने के लिए साधारण पारंपरिक मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस के कोम्पयेर में कम मानव संसाधन का इस्तेमाल होता है, जिससे साल भर में होने वाली तनख्वाह के खर्चे के अलावा अधिक लेबर की समस्या से भी निजात मिलती है।
  5. प्लाईवुड का उत्पादन अधिक नियंत्रण और नियमों के आधीन चलता है।
  6. फॉर्मलडीहाइड उत्सर्जन में कमी के कारण स्वच्छ और गैस मुक्त वातावरण मिलता हैं, जिससे फैक्ट्री के अन्दर हमेशा अच्छा माहौल बना रहता है और हमारे पर्यावरणीय नियमों की भी अनुपालना होती है।
  7. कम उर्जा और बिजली की खपत इस प्रक्रिया को और भी किफायती बनती है और राष्ट्र हित में हमारी सहभागिता को बढ़ाता है।
  8. इस प्रकार से बना प्लाईवुड अपनी गुणवत्ता और नियमों की अनुपालना की वजह से पूरे विश्व में आसानी से डिमांड में रहता है जिससे इसके निर्यात की सम्भावना प्रबल रहती है।

अतः कुल मिलाकर हाई मोइस्चर वाली विनियर के इस्तेमाल और कम फॉर्मलडीहाइड उत्सर्जन वाली रेसिन के उपयोग से न केवल हमारी मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री आर्थिक मजबूती को प्राप्त कर सकती है वहीं देश हित में भी अपना अधिकतम योगदान भी दे सकती है।

यह तकनीक अब पूर्ण रूप से वुड टेक्नोलॉजिस्ट एसोसिएशन के पास उपलब्ध है.. आप अधिक जानकारी के लिए आप एसोसिएशन के अध्यक्ष श्री गजेन्द्र राजपूत ($91 92159 28163) या महासचिव श्री मनोज ग्वाडी ($91 98975 44467) जी से संपर्क कर सकते हैं।